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कांग्रेस की बाड़ाबंदी में क्यों पहुंची 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी? अपहरण-मारपीट के आरोप, जानें कानूनी मायने

कांग्रेस की बाड़ाबंदी में क्यों पहुंची 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी? अपहरण-मारपीट के आरोप, जानें कानूनी मायने

राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के बाद अब मेयर और सभापति के चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए अलग-अलग जगहों पर बाड़ाबंदी की है। इसी दौरान कांग्रेस की बाड़ाबंदी वाली जगहों पर पुलिस टीमों के पहुंचने और पार्षदों से पूछताछ या कार्रवाई को लेकर विवाद सामने आया है।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया है कि पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल कांग्रेस पार्षदों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस का दावा है कि कई जगह उसके पार्षदों के ठहरने वाले होटलों में पुलिस पहुंची। दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई को लेकर सामने आई शिकायतों की अलग-अलग जगहों पर जांच की बात कही जा रही है।

बाड़ाबंदी क्यों की जाती है?

नगर निकायों में अध्यक्ष और मेयर का चुनाव निर्वाचित पार्षद करते हैं। ऐसे चुनावों में कई बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

इसी वजह से पार्टियां अपने पार्षदों को एक साथ रखने के लिए होटल या रिसॉर्ट में ठहराती हैं। इसे राजनीतिक भाषा में बाड़ाबंदी कहा जाता है। राजस्थान के मौजूदा निकाय चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों की ओर से ऐसी व्यवस्था किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।

50 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पहुंचने की वजह क्या?

कांग्रेस का आरोप है कि कई स्थानों पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी उसके पार्षदों के ठहरने वाले स्थानों पर पहुंचे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, डोटासरा ने दावा किया कि कांग्रेस पार्षदों की बाड़ाबंदी वाले 25 स्थानों पर पुलिस टीमें पहुंचीं। सीकर के लोसल में भी कांग्रेस की ओर से बड़ी संख्या में लोगों और वाहनों के पहुंचने का आरोप लगाया गया।

हालांकि, किसी पुलिस टीम का होटल या रिसॉर्ट में पहुंचना अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता। यदि किसी मामले में शिकायत दर्ज हो, कानून-व्यवस्था की स्थिति हो या किसी व्यक्ति से पूछताछ की कानूनी जरूरत हो, तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है। कार्रवाई की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि पुलिस किस कानूनी आधार और प्रक्रिया के तहत वहां पहुंची।

अपहरण और मारपीट की शिकायतों का क्या मतलब?

निकाय चुनाव के दौरान कुछ जगहों से पार्षदों को जबरन ले जाने, धमकाने या मारपीट के आरोप भी सामने आए हैं। कांग्रेस ने पुलिस-प्रशासन से पार्षदों को धमकाने, हिरासत में लेने और मतदान से रोकने से बचने की मांग की है। पार्टी ने सुरक्षित आवागमन और मतदान में किसी तरह की बाधा नहीं डालने की भी मांग रखी है।

अगर किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ जबरन ले जाया जाता है, तो परिस्थितियों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराएं लागू हो सकती हैं। लेकिन केवल किसी पार्षद का होटल या रिसॉर्ट में ठहरना या पार्टी की बाड़ाबंदी में शामिल होना अपने आप में अपहरण नहीं है। यह निर्धारित करने के लिए घटना के वास्तविक तथ्य, व्यक्ति की इच्छा और उपलब्ध साक्ष्यों को देखा जाएगा।

क्या बाड़ाबंदी कानूनी है?

किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने निर्वाचित पार्षदों को एक जगह ठहराना अपने आप में प्रतिबंधित गतिविधि नहीं है। हालांकि, बाड़ाबंदी के दौरान किसी पार्षद को धमकाना, जबरन रोकना, मारपीट करना, रिश्वत देना या मतदान की स्वतंत्रता में गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप करना अलग कानूनी सवाल पैदा कर सकता है।

यही वजह है कि इस पूरे विवाद में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि पार्षद किस होटल में ठहरे थे। यह भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी इच्छा से वहां थे या नहीं और पुलिस या राजनीतिक कार्यकर्ताओं की ओर से की गई किसी कार्रवाई के पीछे क्या कानूनी आधार था।

हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

राजस्थान निकाय चुनाव के दौरान पार्षदों की गिरफ्तारी और चुनाव में उनकी भागीदारी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में भी मामले पहुंचे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाईकोर्ट की विशेष सुनवाई में कुछ पार्षदों को अंतरिम राहत देते हुए गिरफ्तारी से सुरक्षा दी गई, ताकि वे चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सकें।

इस पूरे घटनाक्रम में आरोप और कानूनी रूप से साबित तथ्य अलग-अलग हैं। पुलिस कार्रवाई, कथित अपहरण या मारपीट के प्रत्येक मामले में अंतिम स्थिति जांच, एफआईआर, उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत की कार्यवाही से स्पष्ट होगी।

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