आंखों में धूल कौन झोंक रहा? मशीनों से सफाई के नाम पर 5 कंपनियां उठा रहीं 50 लाख, सड़कों से धूल गायब नहीं
शहर की सड़कों को धूल मुक्त बनाने और सफाई व्यवस्था बेहतर करने के लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए पांच कंपनियों को जिम्मेदारी दिए जाने और करीब 50 लाख रुपये खर्च किए जाने का मामला सामने आया है। लेकिन सवाल यह है कि जब सफाई के नाम पर इतनी रकम खर्च हो रही है, तो सड़कों पर धूल अब तक क्यों नजर आ रही है? मशीनों से सफाई के दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
पांच कंपनियों की जिम्मेदारी पर सवाल
मशीनों से सफाई के लिए पांच कंपनियों को काम सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है। इन कंपनियों पर सफाई व्यवस्था के तहत सड़कों से धूल हटाने की जिम्मेदारी है। इसके बदले करीब 50 लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जा रहा है।
हालांकि, सफाई का काम किस शहर में हो रहा है, यह राशि किस अवधि की है और प्रत्येक कंपनी को कितना भुगतान किया जा रहा है, इसकी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। ऐसे में पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट करने के लिए संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
मशीनें चलने के बाद भी सड़कों पर धूल क्यों?
मशीनों से सफाई का उद्देश्य सड़कों पर जमा धूल को हटाना और हवा में उड़ने वाले धूल के कणों को कम करना है। लेकिन यदि नियमित सफाई के बावजूद सड़कों पर धूल जमा रहती है, तो मशीनों की कार्यक्षमता और सफाई के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सड़क किनारे जमा मिट्टी, निर्माण कार्यों से निकलने वाला मलबा, खुले में पड़ी निर्माण सामग्री और वाहनों की आवाजाही भी धूल बढ़ने के कारण हो सकते हैं। इसलिए सफाई व्यवस्था का आकलन करते समय मशीनों के संचालन के साथ इन कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
भुगतान और सफाई के रिकॉर्ड की जांच जरूरी
इस मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियों को भुगतान किन शर्तों पर किया जा रहा है। मशीनें कितने घंटे चलती हैं, किन सड़कों की सफाई की जाती है और काम की गुणवत्ता की निगरानी कैसे होती है, इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
यदि सफाई के दावों और वास्तविक स्थिति में अंतर है, तो संबंधित विभाग को इसकी जांच कर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तय मानकों के अनुसार काम नहीं होने पर कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा सकती है।
आम लोगों को साफ सड़कों का इंतजार
सड़कों पर उड़ती धूल का असर आम लोगों, दुकानदारों और वाहन चालकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। ऐसे में सफाई के नाम पर खर्च होने वाली राशि का वास्तविक परिणाम दिखना जरूरी है।
फिलहाल पांच कंपनियों और 50 लाख रुपये से जुड़े इस मामले में शहर, संबंधित विभाग और भुगतान की अवधि की पुष्टि होना बाकी है। इन जानकारियों और आधिकारिक रिकॉर्ड के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सफाई व्यवस्था में कहां कमी है और जिम्मेदारी किसकी बनती है।

