भगीरथ को जिस तरह गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय दिया जाता है, उसी तरह राजस्थान के रेगिस्तान तक पानी पहुंचाने का श्रेय महाराजा गंगासिंह को दिया जाता है। यही कारण है कि उन्हें अक्सर “राजस्थान का भागीरथ” कहा जाता है।
थार मरुस्थल सदियों से पानी की कमी, सूखे और कठिन जीवन के लिए जाना जाता रहा है। पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर और आसपास के इलाकों में लोगों को पीने के पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। खेती लगभग असंभव मानी जाती थी और जीवन पूरी तरह मानसून पर निर्भर था।
ऐसे समय में बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह ने रेगिस्तान तक पानी पहुंचाने का सपना देखा। उन्होंने पंजाब की नदियों के पानी को राजस्थान तक लाने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की। उनकी दूरदर्शिता और प्रयासों के चलते “गंग नहर” परियोजना अस्तित्व में आई, जिसने बीकानेर क्षेत्र की तस्वीर बदल दी।
गंग नहर सतलुज नदी के पानी को रेगिस्तानी क्षेत्रों तक पहुंचाने वाली उस दौर की ऐतिहासिक परियोजना थी। इस नहर के आने से बंजर जमीन पर खेती शुरू हुई और लोगों को राहत मिली। बाद में यही सोच आगे बढ़ते हुए विशाल इंदिरा गांधी नहर परियोजना का आधार बनी।
इतिहासकारों के अनुसार महाराजा गंगासिंह केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी योजनाकार भी थे। उन्होंने समझ लिया था कि राजस्थान के विकास की सबसे बड़ी कुंजी पानी है। इसलिए उन्होंने जल प्रबंधन और सिंचाई परियोजनाओं को विशेष प्राथमिकता दी।
उनके प्रयासों का असर यह हुआ कि पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों में खेती और पशुपालन को नई जिंदगी मिली। आज जिन क्षेत्रों में हरियाली दिखाई देती है, वहां कभी केवल रेत के टीले हुआ करते थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महाराजा गंगासिंह उस समय यह पहल नहीं करते, तो शायद रेगिस्तान में पानी पहुंचाने की इतनी बड़ी योजनाओं की नींव भी नहीं पड़ती। यही कारण है कि उन्हें “राजस्थान का भागीरथ” कहा जाता है।
राजस्थान के इतिहास में महाराजा गंगासिंह का नाम केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि रेगिस्तान में जीवन की धारा बहाने वाले दूरदर्शी नेता के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा।

