‘जो अच्छा महसूस कराए वो गुड टच’, अजीब लगे तो बैड टच; बच्चों को पॉक्सो एक्ट की भी दी जानकारी
बच्चों को सुरक्षित स्पर्श और असुरक्षित स्पर्श के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में अधिकारियों ने बच्चों को गुड टच और बैड टच के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी। बच्चों को बताया गया कि ऐसा स्पर्श जिससे उन्हें सुरक्षित और अच्छा महसूस हो, उसे सामान्य तौर पर गुड टच माना जा सकता है, जबकि किसी व्यक्ति का ऐसा स्पर्श जिससे बच्चा असहज, डर या अजीब महसूस करे, वह बैड टच हो सकता है।
अधिकारियों ने बच्चों से कहा कि उन्हें अपने शरीर और उसकी सुरक्षा को लेकर जागरूक रहना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के गलत व्यवहार या असहज स्पर्श को चुपचाप सहने की जरूरत नहीं है।
गलत स्पर्श पर तुरंत आवाज उठाएं
कार्यक्रम के दौरान बच्चों को समझाया गया कि यदि कोई उन्हें गलत तरीके से छूने का प्रयास करता है या ऐसा व्यवहार करता है जिससे वे असहज महसूस करें तो उन्हें तुरंत दृढ़ता से ‘नहीं’ या ‘रुकिए’ कहना चाहिए। इसके बाद किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति, माता-पिता, शिक्षक या संबंधित अधिकारी को घटना की जानकारी देनी चाहिए।
अधिकारियों ने कहा कि बच्चों को डरकर चुप नहीं रहना चाहिए। किसी भी संदिग्ध या गलत व्यवहार की जानकारी समय पर देने से बच्चे को सुरक्षित रखने के साथ आरोपी के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
पॉक्सो एक्ट की दी जानकारी
जागरूकता कार्यक्रम में बच्चों को पॉक्सो एक्ट यानी लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के बारे में भी जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए कानून में विशेष प्रावधान किए गए हैं।
बच्चों को यह भी बताया गया कि किसी घटना के बाद शर्म या डर के कारण उसे छिपाने के बजाय तुरंत किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताना जरूरी है। परिवार और स्कूल की जिम्मेदारी है कि बच्चे की बात गंभीरता से सुनी जाए और उसे सुरक्षित वातावरण दिया जाए।
जागरूकता से बच्चे होंगे सुरक्षित
कार्यक्रम में अधिकारियों ने कहा कि बच्चों को कम उम्र से ही सुरक्षा से जुड़े जरूरी विषयों की जानकारी देना बेहद महत्वपूर्ण है। गुड टच और बैड टच की समझ होने से बच्चे संदिग्ध व्यवहार को पहचान सकते हैं और समय रहते मदद मांग सकते हैं।
बच्चों ने भी जागरूकता कार्यक्रम में रुचि दिखाई और अधिकारियों से सवाल पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया। कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को भयभीत करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाना रहा।
अधिकारियों ने अभिभावकों और शिक्षकों से भी अपील की कि वे बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें, ताकि बच्चे किसी भी परेशानी को बिना झिझक उनके साथ साझा कर सकें।

