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अमेरिका-इजराइल-ईरान तनाव का असर भारत तक, हाड़ौती के लहसुन किसानों पर पड़ा महंगाई का झटका

अमेरिका-इजराइल-ईरान तनाव का असर भारत तक, हाड़ौती के लहसुन किसानों पर पड़ा महंगाई का झटका

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत के किसानों और कृषि कारोबार पर भी देखने को मिल रहा है। खासकर राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र के लहसुन किसानों पर इसका बड़ा आर्थिक असर पड़ा है।

जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव के चलते पेट्रोकेमिकल सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा असर प्लास्टिक उत्पादन और उससे जुड़े उत्पादों पर पड़ा है। इसी कारण प्लास्टिक के कट्टों (बोरियों) की कीमतों में अचानक तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे किसानों की लागत में इजाफा हो गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और तेल रिफाइनरियों व पेट्रोलियम ढांचे पर हमलों के कारण वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई है। इसका असर कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों पर पड़ा है, जिससे पॉलीमर इंडस्ट्री में उत्पादन लागत तेजी से बढ़ गई है।

इसका सीधा असर भारत में पैकेजिंग सामग्री पर पड़ रहा है, खासकर उन प्लास्टिक कट्टों पर जिनका उपयोग कृषि उत्पादों की पैकिंग और ट्रांसपोर्ट में बड़े पैमाने पर किया जाता है। कीमतें बढ़ने से किसानों की लागत में वृद्धि हुई है, जबकि उनकी फसलों के दाम में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है।

Hadoti Region के लहसुन किसान इस बढ़ती लागत से सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि पहले से ही फसल के उचित दाम न मिलने की समस्या बनी हुई थी, और अब पैकेजिंग सामग्री महंगी होने से उनकी आर्थिक स्थिति और दबाव में आ गई है।

किसान संगठनों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का इस तरह कृषि अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना चिंताजनक है। उनका कहना है कि सरकार को इस स्थिति में किसानों को राहत देने के लिए वैकल्पिक और सस्ती पैकेजिंग व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।

वहीं, बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक पॉलीमर और प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों में स्थिरता की उम्मीद कम है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति और युद्ध जैसे हालात का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और आम किसान तक सीधे पहुंच सकता है।

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