नाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर का पाटोत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया
राजस्थान के नाथद्वारा स्थित प्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर में फाल्गुन सप्तमी के पावन अवसर पर परंपरानुसार पाटोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर मंदिर में भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिला, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, विक्रम संवत् 1728 की फाल्गुन वद सप्तमी के दिन प्रभु श्रीनाथजी को पहली बार नाथद्वारा मंदिर में तिलकायत दामोदरजी (दाऊजी) प्रथम महाराज द्वारा पाट पर विराजित किया गया था। इसी शुभ घटना की स्मृति में हर वर्ष इस दिन पाटोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है और श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पाटोत्सव के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया। फूलों, रंग-बिरंगी सजावट और पारंपरिक श्रृंगार से श्रीनाथजी के दर्शन अत्यंत मनोहारी लगे। प्रभु के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और मंदिर परिसर “जय श्रीनाथजी” के जयघोष से गूंज उठा।
इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चारण, भजन-कीर्तन और पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई। सेवाधिकारी और मंदिर के पुजारियों ने परंपरानुसार सभी धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराया। श्रद्धालुओं ने प्रभु के समक्ष अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए सुख-समृद्धि की कामना की।
पाटोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि यह पुष्टिमार्गीय परंपरा और आस्था का भी प्रतीक है। यह दिन श्रीनाथजी के नाथद्वारा में प्रतिष्ठापन की स्मृति को जीवंत करता है और श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बनता है।
मंदिर प्रशासन ने इस अवसर पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की थीं, ताकि दर्शन और पूजा में किसी प्रकार की असुविधा न हो। सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
फिलहाल, पाटोत्सव का यह आयोजन श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का सुंदर संगम बनकर संपन्न हुआ, जिसने एक बार फिर नाथद्वारा को आध्यात्मिकता और आस्था के केंद्र के रूप में स्थापित किया।

