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भारत में कम बारिश की आशंका के बीच ‘सुपर अल-नीनो’ की चेतावनी, मई-जुलाई में सक्रिय होने की संभावना

भारत में कम बारिश की आशंका के बीच ‘सुपर अल-नीनो’ की चेतावनी, मई-जुलाई में सक्रिय होने की संभावना

देश में इस साल सामान्य से कम मानसून बारिश की आशंका के बीच मौसम विशेषज्ञों ने एक बार फिर ‘सुपर अल-नीनो’ को लेकर चिंता जताई है। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के नए अनुमान के अनुसार, यह जलवायु पैटर्न आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम को प्रभावित कर सकता है, जिसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ने की संभावना है।

अमेरिकी मौसम एजेंसी नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर में तापमान में हो रहे बदलावों के चलते अल-नीनो की स्थिति मई से जुलाई 2026 के बीच सक्रिय हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति और मजबूत होती है, तो इसे “सुपर अल-नीनो” की श्रेणी में रखा जा सकता है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर के सतही जल के सामान्य से अधिक गर्म होने पर वैश्विक वायुमंडलीय पैटर्न प्रभावित होते हैं। इसका सीधा असर दक्षिण एशिया के मानसून सिस्टम पर पड़ता है, जिससे भारत में बारिश की मात्रा और वितरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

भारत में मानसून की भूमिका कृषि, अर्थव्यवस्था और जल संसाधनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में यदि अल-नीनो मजबूत होता है, तो कई क्षेत्रों में औसत से कम बारिश और लंबे सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका रहती है। खासकर मध्य भारत, उत्तर भारत और कुछ कृषि-प्रधान क्षेत्रों पर इसका प्रभाव अधिक देखा जा सकता है।

भारतीय मौसम विभाग और वैश्विक एजेंसियां लगातार समुद्री तापमान और वायुमंडलीय दबाव में हो रहे बदलावों पर नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल शुरुआती संकेतों के आधार पर ही अनुमान लगाए जा रहे हैं, लेकिन स्थिति की सटीकता आने वाले कुछ हफ्तों में और स्पष्ट हो सकती है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि अल-नीनो का प्रभाव केवल बारिश तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह तापमान में वृद्धि, हीटवेव की तीव्रता और मौसम की अनिश्चितता को भी बढ़ा सकता है। इसी वजह से इसे वैश्विक जलवायु व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

भारत में कृषि विशेषज्ञों ने संभावित स्थिति को देखते हुए किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि वैकल्पिक फसलों की योजना, जल संरक्षण और सिंचाई संसाधनों का बेहतर प्रबंधन इस तरह की परिस्थितियों में बेहद जरूरी हो जाता है।

हालांकि, मौसम वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि अभी यह प्रारंभिक अनुमान है और “सुपर अल-नीनो” की पुष्टि तभी होगी जब समुद्री तापमान और वायुमंडलीय डेटा लगातार इसी प्रवृत्ति को दर्शाएंगे।

फिलहाल, इस चेतावनी ने मौसम विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले महीनों में इस पर और स्पष्ट जानकारी मिलने की उम्मीद है, जो भारत के मानसून पूर्वानुमान के लिए बेहद अहम साबित होगी।

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