राजस्थान में खेजड़ी बचाओ आंदोलन इन दिनों चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है। इसकी शुरुआत बीकानेर से हुई, जहां स्थानीय लोगों ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए खेजड़ी वृक्ष की कटाई का विरोध किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन बड़े पैमाने पर फैल गया और अब इसमें पर्यावरण कार्यकर्ता, संत समाज और राजनीतिक दल भी खुलकर शामिल हैं। सभी की एकमत यही है कि खेजड़ी वृक्ष को बचाना आवश्यक है।
लेकिन आखिर खेजड़ी वृक्ष में ऐसा क्या खास है, जो इसे सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि मरुधरा की पहचान बना देता है?
1. राजस्थान का राज्य वृक्ष:
खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है और इसे मरुधरा का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें और शाखाएं मरुस्थलीय परिस्थितियों में भी जीवनदायिनी भूमिका निभाती हैं।
2. पारिस्थितिक महत्व:
खेजड़ी वृक्ष रेगिस्तानी मिट्टी को संचित करता है और भूमि कटाव को रोकता है। यह वृक्ष मृदा उर्वरता बढ़ाने और जल संरक्षण में भी सहायक है।
3. कृषि और पशुपालन में योगदान:
खेजड़ी वृक्ष के फल और पत्ते पशुओं के लिए पोषण का स्रोत हैं। इसके फल स्थानीय लोगों के लिए भी खाद्य और औषधीय उपयोग में आते हैं।
4. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:
बीकानेर और अन्य राजस्थान के क्षेत्रों में खेजड़ी सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा रही है। इसे “कल्पवृक्ष” भी कहा जाता है क्योंकि यह सुख-दुख में जीवनदान देने वाला वृक्ष माना जाता है।
5. पर्यावरण आंदोलन का केंद्र:
खेजड़ी की कटाई को लेकर विरोध ने पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संसाधनों के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित किया। आंदोलनकारियों का कहना है कि सौर परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से मरुस्थलीकरण और पारिस्थितिक असंतुलन हो सकता है।
राजस्थान की सरकार ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए खेजड़ी संरक्षण और बढ़ावा देने के लिए कानून और पहल की बात कही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में वादा किया कि खेजड़ी को ‘कल्पवृक्ष’ का दर्जा मिलेगा और इसके संरक्षण के लिए कड़े नियम लागू किए जाएंगे।
इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि राजस्थान की जनता पर्यावरण, संस्कृति और सामाजिक विरासत के मुद्दों पर संवेदनशील है। खेजड़ी बचाने का संघर्ष केवल एक वृक्ष के लिए नहीं, बल्कि मरुधरा की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए है।

