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राजस्थान पंचायत चुनाव: भाजपा-कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर, वीडियो में जाने 16 जिलों में पहले चरण का मतदान 22 अक्टूबर को

राजस्थान पंचायत चुनाव: भाजपा-कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर, वीडियो में जाने 16 जिलों में पहले चरण का मतदान 22 अक्टूबर को

राजस्थान में गांवों की सरकार चुनने के लिए होने जा रहे पंचायत चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए सियासी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गए हैं। पहले चरण में 22 अक्टूबर को 16 जिलों में मतदान होगा। इस चुनाव में जिला परिषद की सीटों पर कब्जे के साथ जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल करना दोनों प्रमुख दलों का बड़ा लक्ष्य है। चुनावी मैदान में मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पूर्व मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। कई सीटों पर बागी उम्मीदवार अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के उम्मीदवारों ने कुछ क्षेत्रों में मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।पहले चरण में 16 जिलों की 586 जिला परिषद सीटों पर 1,693 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सी पार्टी जिला परिषदों में बहुमत हासिल करती है और किसे जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाबी मिलती है।

बाड़मेर में पूर्व मंत्री गफूर अहमद के सामने किसान अली खान

बाड़मेर में पूर्व मंत्री गफूर अहमद की चुनावी प्रतिष्ठा दांव पर है। उनका मुकाबला किसान अली खान से बताया जा रहा है। इस तरह का मुकाबला चुनाव को स्थानीय स्तर पर दिलचस्प बना रहा है। इसके अलावा चार पूर्व विधायक भी चुनावी मैदान में हैं, जिससे कई सीटों पर मुकाबला केवल पार्टी के चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं रह गया है।भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपने समर्थकों को एकजुट रखने की चुनौती है। टिकट नहीं मिलने से नाराज नेता निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतर रहे हैं। ऐसे उम्मीदवारों की मौजूदगी अधिकृत प्रत्याशियों के वोटों पर असर डाल सकती है।

RLP और BAP बिगाड़ सकते हैं भाजपा-कांग्रेस का गणित

इस चुनाव में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। कुछ क्षेत्रों में इन दलों के उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं।RLP के 17 उम्मीदवारों और पांच निर्दलीय प्रत्याशियों को लेकर भी चर्चा है। इनकी चुनावी स्थिति अलग-अलग वार्डों में नतीजों को प्रभावित कर सकती है। कुछ सीटों पर ये उम्मीदवार प्रमुख दलों के वोट काट सकते हैं, जबकि अन्य जगहों पर खुद जीत की स्थिति में पहुंच सकते हैं।हालांकि, इसका वास्तविक असर मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा।

2020 में भाजपा की जीत के बावजूद जिला प्रमुख बनी थीं बागी सुशील कंवर पलाड़ा

पिछले पंचायत चुनाव का उदाहरण भी इस बार चर्चा में है। वर्ष 2020 में भाजपा ने जिला परिषद की 32 में से 21 सीटें जीती थीं। इसके बावजूद क्रॉस वोटिंग और कांग्रेस के समर्थन से भाजपा की बागी सुशील कंवर पलाड़ा जिला प्रमुख बन गई थीं।यह घटनाक्रम बताता है कि जिला परिषद की सीटें जीतना और जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल करना दो अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियां हैं। जिला प्रमुख के चुनाव में निर्वाचित सदस्यों का समर्थन निर्णायक होता है। ऐसे में इस बार भी प्रमुख दलों को केवल अधिक सीटें जीतने के साथ-साथ सदस्यों का समर्थन जुटाने की रणनीति बनानी होगी।

जिला प्रमुख की कुर्सी पर टिकी नजरें

पहले चरण में 586 जिला परिषद सीटों पर 1,693 उम्मीदवार मैदान में हैं। भाजपा और कांग्रेस के लिए यह चुनाव स्थानीय संगठन की ताकत और नेताओं के प्रभाव का आकलन करने का अवसर भी है।जहां भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने में जुटे हैं, वहीं बागी और क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार चुनावी समीकरण बदलने की कोशिश कर रहे हैं। परिणामस्वरूप कई सीटों पर मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है।

मतदान की तारीख पर जरूरी सुधार: राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, पहले चरण के लिए मतदान दलों का प्रस्थान 22 अक्टूबर को और जिला परिषद व पंचायत समिति सदस्यों का मतदान 23 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। इसलिए 22 अक्टूबर को मतदान होने की जानकारी आधिकारिक कार्यक्रम से मेल नहीं खाती।

राजस्थान निर्वाचन आयोग कार्यक्रम

अब सबकी नजर इस बात पर है कि पहले चरण में मतदाता किसे समर्थन देते हैं और कौन-सी पार्टी जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने के लिए जरूरी राजनीतिक समर्थन जुटा पाती है।

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