राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 75 वर्ष से अधिक उम्र के दंपती की 58 साल पुरानी शादी को समाप्त करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वैवाहिक जीवन में आने वाले मामूली विवाद, मतभेद और सामान्य उतार-चढ़ाव को ‘क्रूरता’ का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह फैसला भरतपुर पारिवारिक न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया।
मामला एक बुजुर्ग दंपती से जुड़ा था, जिनकी शादी लगभग छह दशक पहले हुई थी। पति-पत्नी के बीच लंबे समय से पारिवारिक और संपत्ति संबंधी विवाद चल रहा था। निचली अदालत में दायर याचिका में वैवाहिक संबंधों में कथित क्रूरता और असहनीय परिस्थितियों का हवाला देकर तलाक की मांग की गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि विवाद मुख्य रूप से संपत्ति के बंटवारे को लेकर था, जिसे तलाक का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विवाह एक सामाजिक और कानूनी संस्था है, जिसे केवल गंभीर और प्रमाणित कारणों के आधार पर ही समाप्त किया जा सकता है। सामान्य पारिवारिक तकरार, विचारों में मतभेद या संपत्ति को लेकर असहमति को वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि इतने लंबे वैवाहिक जीवन के बाद केवल संपत्ति विवाद के चलते संबंध विच्छेद करना उचित नहीं है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और पारिवारिक न्यायालय के आदेश का विस्तृत परीक्षण किया। उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया। अदालत ने कहा कि विवाह के 58 वर्षों में दंपती ने जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव साथ झेले हैं, ऐसे में अंतिम समय में वैवाहिक संबंध तोड़ना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय पारिवारिक मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। अदालत का रुख इस बात को रेखांकित करता है कि तलाक को अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब विवाद का मूल कारण संपत्ति या आर्थिक मतभेद हो।
फैसले में न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि संपत्ति को लेकर कोई वैध दावा या विवाद है, तो उसके समाधान के लिए अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। विवाह विच्छेद को ऐसे विवादों का समाधान नहीं माना जा सकता।
इस निर्णय के बाद कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला समाज में वैवाहिक संबंधों की स्थिरता और गरिमा को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, अदालत ने दोनों पक्षों को सलाह दी कि वे आपसी समझ और संवाद के माध्यम से अपने मतभेद सुलझाने का प्रयास करें।
कुल मिलाकर, राजस्थान उच्च न्यायालय का यह फैसला यह संदेश देता है कि वैवाहिक जीवन के सामान्य विवादों को बढ़ा-चढ़ाकर क्रूरता का रूप नहीं दिया जा सकता और विवाह जैसी संस्था को समाप्त करने से पहले सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।

