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RTE योजना पर सवाल: मुफ्त शिक्षा का अधिकार बना मजाक, गरीब बच्चों का एडमिशन अटका

RTE योजना पर सवाल: मुफ्त शिक्षा का अधिकार बना मजाक, गरीब बच्चों का एडमिशन अटका

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के पीछे मकसद था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। लेकिन मौजूदा हालात में यह योजना कई जगहों पर केवल कागजों तक सीमित होती दिख रही है।

जानकारी के अनुसार, इस बार निजी स्कूलों में एडमिशन की सीटें सीमित कर दी गई हैं, जिससे आवेदनों के मुकाबले बहुत कम बच्चों को प्रवेश मिल पा रहा है। इसके अलावा नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी जैसी प्रारंभिक कक्षाओं की फीस को लेकर भी सरकार ने स्पष्टता नहीं दिखाई है, जिसके कारण स्कूलों ने इन कक्षाओं में RTE के तहत प्रवेश देने से हाथ खींच लिया है।

गरीब परिवारों पर असर:
इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर उन गरीब परिवारों पर पड़ रहा है, जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए RTE योजना पर निर्भर हैं। कई अभिभावक अपने बच्चों के एडमिशन के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है।

निजी स्कूलों की उदासीनता:
वहीं, निजी स्कूल भी इस योजना में खास रुचि नहीं दिखा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार द्वारा समय पर फीस प्रतिपूर्ति नहीं की जाती, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसी कारण कई स्कूल RTE के तहत प्रवेश देने में आनाकानी कर रहे हैं।

नीतिगत खामियां उजागर:
विशेषज्ञों का मानना है कि योजना के क्रियान्वयन में कई खामियां हैं। यदि सरकार समय पर भुगतान और स्पष्ट दिशा-निर्देश सुनिश्चित करे, तो इस योजना को प्रभावी बनाया जा सकता है।

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