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डॉक्टरों के निजी अस्पताल बंद, सरकारी अस्पतालों पर बढ़ा मरीजों का दबाव

डॉक्टरों के निजी अस्पताल बंद, सरकारी अस्पतालों पर बढ़ा मरीजों का दबाव

जयपुर में डॉक्टर के परिजनों के साथ कथित मारपीट की घटना के विरोध में शहर के 200 से अधिक निजी अस्पतालों के शटडाउन पर चले जाने से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो गई हैं। निजी अस्पतालों के बंद होने के बाद अब मरीजों के लिए सबसे बड़ा सहारा सरकारी अस्पताल बनकर उभरे हैं। राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है, जिससे वहां व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल रहा है।

जानकारी के अनुसार, डॉक्टर समुदाय ने घटना के विरोध में सामूहिक रूप से निजी अस्पतालों की सेवाएं बंद रखने का निर्णय लिया है। इसके चलते ओपीडी सेवाएं, सामान्य जांच और कई गैर-आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं प्रभावित हुई हैं। हालांकि, गंभीर और आपातकालीन मरीजों के लिए कुछ अस्पतालों में सीमित सेवाएं जारी रखी गई हैं, लेकिन अधिकांश मरीजों को सरकारी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।

शहर के सवाई मानसिंह अस्पताल, महिला अस्पताल और अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों में सुबह से ही मरीजों और उनके परिजनों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। पर्ची काउंटर से लेकर जांच केंद्रों तक भारी भीड़ नजर आई। कई मरीजों ने बताया कि निजी अस्पताल बंद होने के कारण उन्हें सरकारी अस्पताल आना पड़ा, जहां पहले से ही बड़ी संख्या में मरीज मौजूद हैं।

सरकारी अस्पताल प्रशासन का कहना है कि बढ़ती भीड़ को देखते हुए अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को अलर्ट मोड पर रखा गया है ताकि मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। अस्पतालों में अतिरिक्त काउंटर खोलने और जरूरी दवाइयों की उपलब्धता बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।

वहीं दूसरी ओर, निजी अस्पतालों के शटडाउन से आम लोगों की चिंता बढ़ गई है। कई मरीज ऐसे हैं जिनका इलाज नियमित रूप से निजी अस्पतालों में चल रहा था। अस्पताल बंद होने से उन्हें दवाइयों, जांच और डॉक्टरों से परामर्श लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर बुजुर्ग मरीजों और छोटे बच्चों के अभिभावकों में अधिक चिंता देखी जा रही है।

डॉक्टर संगठनों का कहना है कि चिकित्सकों और उनके परिजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि जब तक सुरक्षा को लेकर ठोस आश्वासन नहीं मिलता, तब तक आंदोलन जारी रह सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि चिकित्सा कर्मियों के साथ बढ़ती हिंसा चिंता का विषय है और इस पर सख्त कानून लागू होना चाहिए।

इधर प्रशासन लगातार डॉक्टर संगठनों से बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही सहमति बन जाएगी और निजी अस्पतालों की सेवाएं फिर से सामान्य हो सकेंगी। फिलहाल शहर में सरकारी अस्पताल ही हजारों मरीजों के लिए राहत का मुख्य केंद्र बने हुए हैं।

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