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राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में प्राचार्य बेहरवाल का बयान, इतिहास को भावनाओं से अलग समझने की अपील

राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में प्राचार्य बेहरवाल का बयान, इतिहास को भावनाओं से अलग समझने की अपील

राजस्थान के ब्यावर स्थित सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय में आयोजित राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की 31वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय अजमेर के प्राचार्य मनोज बेहरवाल ने अपने संबोधन के दौरान एक महत्वपूर्ण और ध्यान खींचने वाला बयान दिया।

24 जनवरी को अपने भाषण में प्राचार्य बेहरवाल ने कहा कि 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का नाम राजनीतिक और वैश्विक मंच पर आया, जबकि 15 अगस्त 1947 की सुबह भारत का उदय हुआ। उन्होंने इसे समय के अंतर के रूप में बताते हुए इतिहास को भावनाओं से अलग और तथ्यों के आधार पर समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।

बेहरवाल ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन के इतिहास को समझने के लिए सिर्फ भावनाओं या व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर रहना उचित नहीं है। उन्होंने छात्रों और शिक्षाविदों से अपील की कि वे इतिहास को तथ्यों, दस्तावेजों और विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर पढ़ें और समझें।

कॉन्फ्रेंस में उपस्थित शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने प्राचार्य के इस दृष्टिकोण की सराहना की। उनका कहना था कि यह दृष्टिकोण छात्रों में तार्किक और विवेकपूर्ण सोच को बढ़ावा देता है और इतिहास के अध्ययन में वैज्ञानिक और निष्पक्ष नजरिया विकसित करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास और सामाजिक अध्ययन में भावनात्मक और राजनीतिक दृष्टिकोण अक्सर तथ्यों की स्पष्ट समझ में बाधा डालते हैं। ऐसे में प्राचार्य बेहरवाल का बयान यह संदेश देता है कि इतिहास को तथ्यात्मक और निष्पक्ष तरीके से समझना ही समाज और शिक्षा के लिए लाभकारी है।

कॉन्फ्रेंस में विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शोधार्थी, प्रोफेसर और सामाजिक वैज्ञानिक उपस्थित थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान के विभाजन, स्वतंत्रता संग्राम और उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों पर विवाद और चर्चा की। इस दौरान प्राचार्य बेहरवाल का यह बयान मुख्य विषय बन गया और सोशल मीडिया पर भी चर्चा का केंद्र बन गया।

बेहरवाल ने यह भी कहा कि इतिहास को भावनाओं की दृष्टि से देखना कभी-कभी समाज में गलत धारणाओं और पूर्वाग्रह को जन्म देता है। इसलिए यह आवश्यक है कि विद्यार्थी और शोधकर्ता इतिहास को वास्तविक घटनाओं, तारीखों और दस्तावेजों के आधार पर समझें।

कॉन्फ्रेंस के आयोजकों ने बताया कि इस तरह के विचार विमर्श से छात्रों और शिक्षकों को इतिहास और समाजशास्त्र में शोध और अध्ययन के नए दृष्टिकोण मिलते हैं। उन्होंने कहा कि बेहरवाल जैसे शिक्षाविदों का दृष्टिकोण शिक्षा और समाज में विवेकपूर्ण सोच को बढ़ावा देता है।

इस प्रकार, राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की 31वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में प्राचार्य मनोज बेहरवाल का यह बयान इतिहास और सामाजिक अध्ययन में तथ्यात्मक और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने के महत्व को उजागर करता है। यह छात्रों, शोधकर्ताओं और समाज के लिए स्मरणीय और प्रेरक संदेश साबित हुआ।

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