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खेत में कौड़ियों के भाव, शहर में महंगी सब्जियां! कुशीनगर की भिंडी 2 रुपये किलो तो मुंबई में 80 रुपये तक बिक रही

खेत में कौड़ियों के भाव, शहर में महंगी सब्जियां! कुशीनगर की भिंडी 2 रुपये किलो तो मुंबई में 80 रुपये तक बिक रही

देश में सब्जियों की कीमतों में भारी अंतर एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जिस भिंडी को किसान 2 रुपये प्रति किलो की दर पर बेचने को मजबूर हैं, वही भिंडी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 60 से 80 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। इसी तरह कुशीनगर में 15 रुपये किलो बिकने वाला करेला मुंबई के फुटकर बाजार में 80 रुपये प्रति किलो और थोक बाजार में करीब 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।

किसानों और उपभोक्ताओं के बीच कीमतों का यह बड़ा अंतर कृषि विपणन व्यवस्था और सप्लाई चेन पर कई सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर किसान अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर शहरों में उपभोक्ताओं को सब्जियों के लिए कई गुना अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

किसानों को नहीं मिल रहा उत्पादन लागत का लाभ

कुशीनगर और आसपास के क्षेत्रों में इस समय भिंडी, करेला और अन्य हरी सब्जियों का उत्पादन भरपूर मात्रा में हो रहा है। अधिक आवक और सीमित खरीदारों के कारण मंडियों में कीमतें लगातार गिर रही हैं। हालात ऐसे हैं कि कई किसान अपनी उपज की तुड़ाई और ढुलाई का खर्च निकालने में भी मुश्किल महसूस कर रहे हैं।

किसानों का कहना है कि 2 से 5 रुपये किलो के भाव पर सब्जियां बेचने से लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उपज का उचित दाम नहीं मिल पा रहा।

मुंबई में कई गुना बढ़ जाती है कीमत

दूसरी तरफ मुंबई जैसे बड़े महानगरों में यही सब्जियां कई गुना अधिक कीमत पर बिक रही हैं। थोक मंडियों से लेकर खुदरा बाजार तक पहुंचते-पहुंचते कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो जाती है। परिवहन खर्च, भंडारण, बिचौलियों का मार्जिन और स्थानीय बाजार की मांग कीमतों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

भिंडी जहां कुशीनगर में 2 रुपये किलो के भाव पर उपलब्ध है, वहीं मुंबई में इसकी खुदरा कीमत 60 से 80 रुपये किलो तक पहुंच रही है। करेला भी खेत से निकलकर महानगर तक पहुंचते-पहुंचते पांच गुना से अधिक महंगा हो जाता है।

सप्लाई चेन और बिचौलियों पर उठे सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों और उपभोक्ताओं के बीच मौजूद लंबी सप्लाई चेन कीमतों में इस बड़े अंतर का प्रमुख कारण है। कृषि उत्पाद कई स्तरों से होकर गुजरते हैं, जिसके चलते अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले उनकी कीमत काफी बढ़ जाती है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि किसानों को सीधे बाजारों और उपभोक्ताओं से जोड़ने की व्यवस्था मजबूत की जाए, तो किसानों को बेहतर मूल्य और उपभोक्ताओं को सस्ती सब्जियां मिल सकती हैं।

किसानों ने की बेहतर बाजार व्यवस्था की मांग

सब्जी उत्पादक किसानों का कहना है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिससे उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके। किसानों का मानना है कि कोल्ड स्टोरेज, बेहतर परिवहन नेटवर्क और सीधे विपणन की सुविधाएं उपलब्ध होने से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

हरी सब्जियों की कीमतों में यह भारी अंतर एक बार फिर दिखाता है कि खेत से थाली तक का सफर किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है। जब तक कृषि विपणन व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक किसान कम दाम और उपभोक्ता महंगी कीमतों की दोहरी मार झेलते रहेंगे।

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