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राजस्थान में राजनीतिक चंदे का खुलासा: BJP को 77% हिस्सा, कांग्रेस पीछे

राजस्थान में राजनीतिक चंदे का खुलासा: BJP को 77% हिस्सा, कांग्रेस पीछे

राजस्थान में वर्ष 2024-25 के दौरान राजनीतिक दलों को मिले चंदे को लेकर एक अहम रिपोर्ट सामने आई है, जिसने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में राज्य के राजनीतिक दलों को कुल 112.97 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस चंदे में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिला है। भाजपा को कुल 87.51 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जो कुल चंदे का करीब 77 प्रतिशत हिस्सा है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि फंडिंग के मामले में भाजपा ने अन्य दलों की तुलना में काफी बढ़त बना रखी है।

वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) इस मामले में काफी पीछे नजर आई। कांग्रेस को इस दौरान लगभग 25 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो कुल राशि का करीब 22 प्रतिशत है। इस अंतर ने राज्य की राजनीतिक फंडिंग के समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट और संगठित स्रोतों से आता है। ऐसे में यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि क्या फंडिंग का यह असंतुलन चुनावी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक फंडिंग मिलने से किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव प्रचार, संसाधनों और संगठनात्मक मजबूती में बढ़त मिलती है। ऐसे में भाजपा की बढ़त उसे चुनावी मैदान में रणनीतिक रूप से मजबूत बना सकती है।

हालांकि, कांग्रेस और अन्य दल इस तरह की रिपोर्टों को लेकर समय-समय पर पारदर्शिता और चुनावी सुधारों की मांग उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक फंडिंग में संतुलन और पारदर्शिता सुनिश्चित करना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद यह मुद्दा भी उठ रहा है कि क्या चुनावी चंदे के नियमों में और सख्ती लाई जानी चाहिए, ताकि सभी दलों को समान अवसर मिल सके। चुनावी फंडिंग की पारदर्शिता लंबे समय से बहस का विषय रही है और ADR की रिपोर्ट ने इसे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

फिलहाल, राजस्थान में चंदे के इन आंकड़ों ने राजनीतिक समीकरणों और दलों की ताकत को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या इस पर कोई नीतिगत बदलाव होता है या यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाता है।

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