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मदन दिलावर ने गहलोत और डोटासरा पर बोला हमला, देखे विडियो

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राजस्थान में पंचायत और शहरी निकायों के पुनर्गठन को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। बुधवार को पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने इस मुद्दे पर मौजूदा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुनर्गठन प्रक्रिया में भारी धांधली की जा रही है। गहलोत ने दावा किया कि यह पूरा निर्णय राजनीतिक फायदे के मकसद से लिया जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ठेस पहुंच रही है।

गहलोत ने कहा, "सरकार ने जिस तरीके से पंचायत और शहरी निकायों का पुनर्गठन किया है, वह पूरी तरह पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। जनहित को नजरअंदाज कर केवल राजनीतिक समीकरण साधे जा रहे हैं। यह लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है।"

पूर्व मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है। कांग्रेस पार्टी ने सरकार से पुनर्गठन की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करने और इसमें पारदर्शिता लाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि अगर पुनर्गठन जरूरी है, तो इसके लिए व्यापक जनसुनवाई और पंचायतों की राय ली जानी चाहिए थी, जो नहीं की गई।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने गहलोत के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक प्रावधानों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार की गई है। राज्य सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि "यह निर्णय ग्रामीण और शहरी विकास को गति देने के लिए लिया गया है, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत।"

सरकार का यह भी दावा है कि पुनर्गठन से प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार होगा, और विकास योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच पाएगा। अधिकारियों का कहना है कि कई स्थानों पर जनसंख्या वृद्धि और भौगोलिक विस्तार के चलते नए वार्ड, ग्राम पंचायतें और नगर निकाय बनाए गए हैं, जिससे विकास कार्यों की निगरानी और क्रियान्वयन आसान होगा।

हालांकि, विपक्ष की दलील है कि यह सब एकतरफा फैसला है और इसमें न तो विपक्षी दलों की राय ली गई और न ही आम जनता को विश्वास में लिया गया। कांग्रेस नेताओं ने मांग की है कि सरकार एक उच्चस्तरीय समिति गठित कर इस पूरे मुद्दे की निष्पक्ष जांच कराए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा और अधिक गरमाने वाला है। यदि विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, तो यह सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है

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