इंदिरा गांधी नहर को राजस्थान की “भागीरथी” कहा जाता है। जिस तरह पौराणिक कथाओं में भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाकर जीवन दिया था, उसी तरह इंदिरा गांधी नहर ने थार के सूखे रेगिस्तान में पानी पहुंचाकर लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया।
पश्चिमी राजस्थान का बड़ा हिस्सा कभी पानी की भारी कमी, सूखे और बंजर जमीन के लिए जाना जाता था। बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और श्रीगंगानगर जैसे इलाकों में खेती करना बेहद मुश्किल था। लोगों को पीने के पानी के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ता था। ऐसे में रेगिस्तान तक पानी पहुंचाने की कल्पना किसी चमत्कार से कम नहीं मानी जाती थी।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने इस असंभव लगने वाले सपने को सच कर दिखाया। पंजाब के हरिके बैराज से निकलने वाली यह नहर सतलुज और ब्यास नदियों का पानी लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों तक पहुंचती है। इसे देश की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में गिना जाता है।
इस नहर के आने के बाद पश्चिमी राजस्थान की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जहां कभी केवल रेत के टीले दिखाई देते थे, वहां आज गेहूं, सरसों, कपास और अन्य फसलें लहलहाती नजर आती हैं। लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचित हुई और हजारों गांवों तक पेयजल पहुंचा।
इंदिरा गांधी नहर ने केवल खेती को ही नहीं बदला, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को नई दिशा दी। लोगों को रोजगार मिला, नए गांव बसे और व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आई। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे क्षेत्र आज राजस्थान के प्रमुख कृषि केंद्रों में गिने जाते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार इस नहर की नींव उस सोच से जुड़ी थी, जिसकी शुरुआत महाराजा गंगासिंह ने “गंग नहर” परियोजना के माध्यम से की थी। बाद में यह सोच विशाल इंदिरा गांधी नहर परियोजना के रूप में विकसित हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंदिरा गांधी नहर केवल एक जल परियोजना नहीं, बल्कि रेगिस्तान में नई जिंदगी बहाने वाली धारा है। यही कारण है कि इसे “राजस्थान की भागीरथी” कहा जाता है।
आज भी पश्चिमी राजस्थान के लाखों लोगों के लिए यह नहर जीवनरेखा बनी हुई है और राजस्थान के विकास की सबसे बड़ी प्रतीकों में से एक मानी जाती है।

