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पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रियों-विधायकों को दी नसीहत, ‘बेटों को सरकारी काम से दूर रखें’

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रियों-विधायकों को दी नसीहत, ‘बेटों को सरकारी काम से दूर रखें’

राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य सरकार के मंत्रियों और विधायकों को अपने बेटों को सरकारी कामकाज से दूर रखने की सख्त सलाह दी है। गुरुवार को जयपुर एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत के दौरान गहलोत ने यह टिप्पणी की, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

मीडिया से बातचीत में अशोक गहलोत ने कहा कि भाजपा सरकार बनने के बाद कई मामलों में नेताओं के बेटों की सरकारी कामकाज में दखलंदाजी बढ़ने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने इस प्रवृत्ति को लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए नुकसानदायक बताया।

गहलोत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि नेताओं के परिवार के सदस्य, विशेषकर बेटे, सीधे तौर पर सरकारी कामकाज या प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप करते हैं, तो इससे न केवल सरकार की छवि प्रभावित होती है, बल्कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की आशंका भी बढ़ जाती है।

उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “बेटों को दूर रखो और अच्छे संस्कार दो, नहीं तो बदनामी सरकार की भी होगी।” पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है और इसे मौजूदा सरकार पर परोक्ष हमला माना जा रहा है।

गहलोत ने आगे कहा कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बनाए रखना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, जब तक सत्ता और प्रशासन में परिवारवाद या अनावश्यक हस्तक्षेप को रोका नहीं जाएगा, तब तक सुशासन की कल्पना अधूरी रहेगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि इस तरह की प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर जनता के विश्वास पर भी पड़ सकता है।

पूर्व मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। विपक्षी दल इसे सरकार पर सीधा निशाना बता रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने अभी इस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अशोक गहलोत का यह बयान केवल नैतिक सलाह नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक संदेश भी छिपा हुआ है। खासकर ऐसे समय में जब राज्य में प्रशासनिक कार्यशैली और राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस चल रही है, यह टिप्पणी सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है।

गहलोत ने यह भी दोहराया कि नेताओं को अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति और प्रशासनिक मामलों से दूरी बनाए रखने की सीख देनी चाहिए, ताकि जनता के बीच गलत संदेश न जाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है, और इसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहिए।

इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार और भाजपा नेता इस टिप्पणी पर क्या रुख अपनाते हैं।

फिलहाल, अशोक गहलोत का यह बयान राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस को जन्म देता दिख रहा है, जिसमें नैतिकता, पारदर्शिता और राजनीतिक प्रभाव जैसे मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं।

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