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उदयपुर में बुजुर्ग दंपती को 3 दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखा, ठगों ने 42.10 लाख रुपए ठगे; खुद को पुणे का विजिलेंस अधिकारी बताया

उदयपुर में बुजुर्ग दंपती को 3 दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखा, ठगों ने 42.10 लाख रुपए ठगे; खुद को पुणे का विजिलेंस अधिकारी बताया

राजस्थान के उदयपुर में साइबर ठगी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। शहर के यूनिवर्सिटी रोड स्थित अक्षांश कॉम्प्लेक्स में रहने वाले बुजुर्ग दंपती को साइबर ठगों ने तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखकर 42.10 लाख रुपए ठग लिए। आरोपियों ने खुद को पुणे का विजिलेंस अधिकारी बताकर दंपती को जांच और गिरफ्तारी का डर दिखाया। लगातार निगरानी और धमकियों के चलते बुजुर्ग दंपती उनकी बातों में आ गए और अपनी मेहनत की कमाई गंवा बैठे।

पीड़ितों की पहचान हिंदुस्तान जिंक के रिटायर्ड अधिकारी भंवरलाल चित्तौड़ा (86) और उनकी पत्नी पार्वती (79) के रूप में हुई है। ठगों ने दोनों को एक कथित आपराधिक मामले में शामिल होने की बात कहकर डराया और तीन दिन तक किसी से संपर्क नहीं करने दिया।

खुद को पुणे का विजिलेंस अधिकारी बताया

जानकारी के अनुसार, साइबर ठगों ने बुजुर्ग दंपती से संपर्क कर खुद को पुणे का विजिलेंस अधिकारी बताया। आरोपियों ने उन्हें बताया कि उनके नाम से जुड़े किसी मामले की जांच चल रही है। इसके बाद ठगों ने गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाना शुरू कर दिया।

आरोपियों ने दंपती को विश्वास दिलाया कि वे एक गंभीर जांच के दायरे में हैं और उन्हें जांच पूरी होने तक अधिकारियों के निर्देशों का पालन करना होगा। इसी बहाने उन्हें लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए अपने संपर्क में रखा गया।

तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखकर की ठगी

ठगों ने दंपती को तीन दिनों तक डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रखा। इस दौरान उन्हें किसी बाहरी व्यक्ति से बात करने और घटना की जानकारी किसी को देने से रोका गया। आरोपियों ने जांच के नाम पर उनकी आर्थिक जानकारी हासिल की और अलग-अलग तरीकों से रकम ट्रांसफर करवा ली।

इस तरह साइबर ठगों ने बुजुर्ग दंपती से कुल 42.10 लाख रुपए हड़प लिए। जब दंपती को ठगी का अहसास हुआ तो उन्होंने मामले की जानकारी संबंधित एजेंसियों को दी।

बुजुर्गों को निशाना बना रहे साइबर ठग

यह घटना एक बार फिर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के बढ़ते खतरे को उजागर करती है। ठग पुलिस, सीबीआई, विजिलेंस और अन्य जांच एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को फोन करते हैं। इसके बाद फर्जी जांच, गिरफ्तारी और बैंक खातों की जांच का डर दिखाकर उनसे पैसे ऐंठते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी वास्तविक पुलिस या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती और न ही जांच के नाम पर निजी बैंक खाते में पैसे जमा कराने को कहती है।

पुलिस से मामले में आरोपियों की पहचान और ठगी की रकम के लेनदेन की जांच की उम्मीद है। लोगों को सलाह दी जाती है कि ऐसे किसी भी फोन कॉल से घबराकर पैसे ट्रांसफर न करें। साइबर ठगी होने पर तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।

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