‘गंग नहर’ का नाम बदलने की मांग तेज, इंदिरा गांधी नहर को फिर पुराने नाम से पुकारने की उठी आवाज
इंदिरा गांधी नहर का निर्माण एक लंबी योजना, तकनीकी चुनौती और कई दशकों की मेहनत का परिणाम है। इसे बनाने का मुख्य उद्देश्य राजस्थान के थार मरुस्थल तक सतलुज और ब्यास नदियों का पानी पहुंचाकर सूखे क्षेत्रों को सिंचित करना था।
शुरुआत: सपना बना योजना
इस नहर की कल्पना सबसे पहले बीकानेर रियासत के शासक महाराजा गंगासिंह ने की थी। उन्होंने महसूस किया कि रेगिस्तान में विकास का रास्ता केवल पानी से ही निकल सकता है। इसी सोच ने आगे चलकर “राजस्थान नहर परियोजना” की नींव रखी।
निर्माण की शुरुआत
वर्ष 1958 में इस परियोजना की औपचारिक शुरुआत की गई। उस समय भारत सरकार के स्तर पर इसे एक बड़े राष्ट्रीय सिंचाई प्रोजेक्ट के रूप में मंजूरी मिली। इसका शिलान्यास तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने किया माना जाता है।
पानी कहां से लाया गया?
इस नहर के लिए सतलुज और ब्यास नदियों के पानी को चुना गया। पंजाब के हरिके बैराज से पानी उठाकर इसे राजस्थान की ओर मोड़ा गया। यह काम उस समय बेहद कठिन था क्योंकि इतनी लंबी दूरी तक रेगिस्तानी क्षेत्र में नहर बनाना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी।
तकनीकी निर्माण
नहर निर्माण में कई चरण शामिल थे—
- मुख्य नहर और वितरण प्रणाली का निर्माण
- रेगिस्तानी रेत में स्थिर नहर की खुदाई
- रेतीली जमीन में पानी रिसाव रोकने के लिए विशेष तकनीक
- शाखा नहरों का जाल ताकि पानी गांव-गांव तक पहुंचे
इस परियोजना को कई चरणों में पूरा किया गया और दशकों तक काम चलता रहा।
नाम परिवर्तन
1984 में इस परियोजना का नाम बदलकर इंदिरा गांधी के नाम पर “इंदिरा गांधी नहर” कर दिया गया। इसके बाद यह इसी नाम से प्रसिद्ध हो गई।
परिणाम: रेगिस्तान में हरियाली
नहर बनने के बाद श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर जैसे इलाकों में बड़ा बदलाव आया। जहां कभी सिर्फ रेत के टीले थे, वहां आज खेत, फसलें और बस्तियां दिखाई देती हैं। यह परियोजना आज भी भारत की सबसे बड़ी सिंचाई प्रणालियों में गिनी जाती है।

