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मौताणा प्रथा का कहर: कोटड़ा क्षेत्र से 1200 से अधिक लोग पलायन को मजबूर

मौताणा प्रथा का कहर: कोटड़ा क्षेत्र से 1200 से अधिक लोग पलायन को मजबूर

कोटड़ा क्षेत्र, जो राजस्थान और गुजरात की सीमा से लगा आदिवासी बहुल इलाका है, इन दिनों एक कुप्रथा के कारण गहरे संकट से गुजर रहा है। यहां प्रचलित “मौताणा प्रथा” ने सैकड़ों परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी है और सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है।

जानकारी के अनुसार, इस कुप्रथा के चलते करीब 350 परिवारों के 1200 से अधिक निर्दोष लोगों को अपने घर, जमीन और गांव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि लोग भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन यापन कर रहे हैं।

मौताणा प्रथा के तहत किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद संबंधित परिवार या समुदाय से भारी मुआवजे की मांग की जाती है। कई बार यह मांग इतनी अधिक होती है कि प्रभावित परिवार इसे पूरा नहीं कर पाते और उन्हें गांव छोड़कर पलायन करना पड़ता है। यही वजह है कि कोटड़ा क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवार बेघर हो चुके हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस प्रथा ने सामाजिक रिश्तों में भी दरार पैदा कर दी है। एक ओर जहां पीड़ित परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांवों में भय और तनाव का माहौल बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कुप्रथा न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि विकास की राह में भी एक बड़ी बाधा है। शिक्षा और जागरूकता की कमी के चलते यह परंपरा आज भी कई क्षेत्रों में जड़ें जमाए हुए है।

प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वह इस प्रथा को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए और प्रभावित परिवारों को पुनर्वास एवं सुरक्षा प्रदान करे। सामाजिक संगठनों ने भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने और लोगों को इस कुप्रथा से बाहर निकालने की आवश्यकता जताई है।

कुल मिलाकर, कोटड़ा क्षेत्र में मौताणा प्रथा का असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट के रूप में सामने आ रहा है, जिसे दूर करने के लिए सामूहिक प्रयासों की सख्त जरूरत है।

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