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सड़क पर ‘मौत का कलर कोड’: काली गाड़ियां ज्यादा खतरनाक, सफेद कारों की तुलना में 12% अधिक एक्सीडेंट रिस्क

सड़क पर ‘मौत का कलर कोड’: काली गाड़ियां ज्यादा खतरनाक, सफेद कारों की तुलना में 12% अधिक एक्सीडेंट रिस्क

सड़क सुरक्षा को लेकर सामने आई एक अहम स्टडी में वाहन के रंग को भी दुर्घटनाओं के जोखिम से जोड़ा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, काली गाड़ियां सफेद कारों की तुलना में ज्यादा खतरनाक साबित हो रही हैं, क्योंकि इनमें एक्सीडेंट का जोखिम लगभग 12 प्रतिशत अधिक पाया गया है।

स्टडी में बताया गया है कि इसका मुख्य कारण विजिबिलिटी यानी दृश्यता है। काले रंग की गाड़ियां विशेषकर रात के समय, बारिश या कम रोशनी वाली परिस्थितियों में सड़क पर कम दिखाई देती हैं, जिससे अन्य वाहन चालकों को उन्हें पहचानने में देर हो सकती है। यही वजह दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ा देती है।

इसके विपरीत, सफेद और हल्के रंग की गाड़ियां अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जिससे सड़क पर उनकी पहचान आसान हो जाती है और टक्कर का खतरा कम होता है। इसी कारण सफेद कारों को अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वाहन का रंग भले ही एकमात्र कारण न हो, लेकिन सड़क सुरक्षा में इसका महत्वपूर्ण योगदान जरूर होता है। इसके अलावा ड्राइविंग स्पीड, रोड कंडीशन, मौसम और ड्राइवर की सतर्कता जैसे कई अन्य कारक भी दुर्घटनाओं को प्रभावित करते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मेटालिक, सिल्वर और हल्के ग्रे रंग की गाड़ियां भी बेहतर विजिबिलिटी के कारण अपेक्षाकृत सुरक्षित श्रेणी में आती हैं। वहीं डार्क ब्लू और ब्लैक रंग की गाड़ियों में रिस्क थोड़ा अधिक देखा गया है।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि वाहन मालिकों को रंग के साथ-साथ रिफ्लेक्टिव स्ट्रिप्स, अच्छी हेडलाइट्स और सुरक्षित ड्राइविंग आदतों पर भी ध्यान देना चाहिए।

कुल मिलाकर यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि सड़क पर सुरक्षा केवल ड्राइविंग पर ही नहीं, बल्कि कई छोटे-छोटे फैक्टर्स पर भी निर्भर करती है, जिनमें वाहन का रंग भी एक अहम भूमिका निभा सकता है।

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