पत्नी पति पर नहीं लगा सकती रेप का आरोप? दो मिनट के वीडियो में जाने राजस्थान हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, दो FIR रद्द
Rajasthan High Court की जयपुर बेंच ने वैवाहिक संबंधों और बलात्कार कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दर्ज कराई गई रेप की एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि वैध विवाह होने की स्थिति में बालिग पत्नी अपने पति पर बलात्कार का मामला दर्ज नहीं करा सकती।यह फैसला जस्टिस Anup Dhand की अदालत ने सुनाया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों के कारण मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं और न्याय मिलने में अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने कहा, “न्याय में देरी नाइंसाफी के समान है।”
दरअसल, कोर्ट के सामने आए एक मामले में जयपुर के एक दंपती ने अंतरजातीय विवाह किया था। विवाह के समय युवती बालिग थी और उसकी उम्र 18 वर्ष बताई गई। शादी के बाद दोनों के बीच पारिवारिक विवाद शुरू हो गया, जिसके बाद मामला फैमिली कोर्ट तक पहुंचा।बताया गया कि युवती ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुंच गए। इसी बीच पत्नी ने अपने पति के खिलाफ रेप का मामला दर्ज कराया। महिला का आरोप था कि पति ने उसे ब्लैकमेल कर विवाह पंजीयन के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए थे।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड और तथ्यों का परीक्षण किया। अदालत ने माना कि दोनों के बीच वैध विवाह हुआ था और महिला विवाह के समय बालिग थी। ऐसे में भारतीय दंड संहिता के तहत पति के खिलाफ रेप का मामला नहीं बनता।कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालता है और वास्तविक मामलों की सुनवाई में देरी का कारण बनता है। अदालत ने इस तरह के मामलों में कानून के सही उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
हाईकोर्ट के इस फैसले को लेकर कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कानून की वर्तमान व्यवस्था के अनुरूप बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे वैवाहिक संबंधों में महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं।गौरतलब है कि भारत में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को लेकर लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस जारी है। फिलहाल भारतीय कानून में पति द्वारा पत्नी के साथ संबंध बनाने को कुछ परिस्थितियों को छोड़कर रेप की श्रेणी में नहीं रखा गया है, यदि पत्नी बालिग हो और विवाह वैध हो। फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर वैवाहिक अधिकारों और कानून की सीमाओं को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

