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राजस्थान में चंदन की खेती का बड़ा प्रोजेक्ट: 12–15 साल में तैयार होंगे ‘हरित सोना’, सूखी आबोहवा और अर्थव्यवस्था दोनों को मिलेगा फायदा

राजस्थान में चंदन की खेती का बड़ा प्रोजेक्ट: 12–15 साल में तैयार होंगे ‘हरित सोना’, सूखी आबोहवा और अर्थव्यवस्था दोनों को मिलेगा फायदा

चंदन के पेड़ दुनिया भर में अपनी खुशबू और औषधीय गुणों के लिए बेहद कीमती माने जाते हैं, लेकिन इन्हें तैयार होने में लंबा समय लगता है। सामान्यतः चंदन का पेड़ पूरी तरह विकसित होने में 12 से 15 साल का समय लेता है। इसी कारण इसे “हरित सोना” भी कहा जाता है।

अब राजस्थान में चंदन की खेती को लेकर एक बड़ा प्रयोग सामने आ रहा है, जो राज्य की जलवायु और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह प्रोजेक्ट सफल होता है तो इससे न केवल प्रदेश की सूखी और शुष्क जलवायु में सुधार की संभावनाएं बढ़ेंगी, बल्कि किसानों और राज्य की आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।

राजस्थान की जलवायु मुख्य रूप से शुष्क और गर्म मानी जाती है, ऐसे में चंदन जैसे बहुमूल्य वृक्षों की खेती एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। हालांकि कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, सही सिंचाई व्यवस्था और वैज्ञानिक पद्धतियों के इस्तेमाल से इस दिशा में सफलता हासिल की जा सकती है।

चंदन की लकड़ी और उससे निकलने वाला तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग में रहता है। इसका उपयोग इत्र, दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों और धार्मिक कार्यों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही कारण है कि इसकी खेती लंबे समय के निवेश के बाद भी अत्यधिक लाभकारी मानी जाती है।

यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो यह राजस्थान के लिए एक नई हरित अर्थव्यवस्था का मार्ग खोल सकती है। साथ ही यह पर्यावरण संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, क्योंकि पेड़ पौधे कार्बन अवशोषण और तापमान नियंत्रण में सहायक होते हैं।

फिलहाल यह योजना परीक्षण और शुरुआती चरण में बताई जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों और किसानों में इसे लेकर सकारात्मक उम्मीदें हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजस्थान की शुष्क धरती पर चंदन की यह हरित क्रांति कितनी सफल होती है।

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