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राजस्थान में बड़ा फैसला, वीडियो में जाने  दो से अधिक संतान वाले भी लड़ सकेंगे पंचायत और निकाय चुनाव

राजस्थान में बड़ा फैसला, वीडियो में जाने  दो से अधिक संतान वाले भी लड़ सकेंगे पंचायत और निकाय चुनाव

प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव करते हुए राज्य सरकार ने करीब 30 साल पुराना प्रावधान खत्म करने का फैसला किया है। अब दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति भी पंचायतीराज और शहरी निकाय चुनाव लड़ सकेंगे। कैबिनेट बैठक में इस संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया, जिससे स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों की सियासत में व्यापक असर देखने को मिल सकता है।

यह प्रावधान पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के दौरान लागू किया गया था। उस समय जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह नियम बनाया गया था, जिसके तहत दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया गया था। अब लगभग तीन दशक बाद इस फैसले को बदल दिया गया है।

कैबिनेट बैठक के बाद कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने जानकारी देते हुए बताया कि मंत्रिमंडल ने “राजस्थान पंचायतीराज संशोधन विधेयक 2026” और “राजस्थान नगरपालिका संशोधन विधेयक 2026” को मंजूरी दे दी है। इन संशोधनों के लागू होने के बाद दो से अधिक संतान वाले व्यक्तियों पर चुनाव लड़ने की जो रोक थी, वह समाप्त हो जाएगी।

कानून मंत्री ने कहा कि दोनों संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ही विधानसभा में पेश किए जाएंगे और पारित होने के बाद नियम प्रभावी हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब यह प्रावधान लागू किया गया था, तब जनसंख्या नियंत्रण बड़ी चुनौती थी। हालांकि वर्तमान सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में हालात बदल चुके हैं, इसलिए सरकार ने यह निर्णय लिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। कई ऐसे संभावित उम्मीदवार, जो अब तक केवल दो से अधिक संतान होने के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे, वे अब सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की नई संभावनाएं खुलेंगी।

हालांकि, इस फैसले पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इससे जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को झटका लग सकता है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि व्यक्तिगत पारिवारिक स्थिति के आधार पर किसी को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करना उचित नहीं था।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह निर्णय आगामी निकाय और पंचायतीराज चुनावों से पहले अहम साबित हो सकता है। इससे कई पुराने नेताओं की वापसी और नए चेहरों की एंट्री संभव है।

सरकार का कहना है कि लोकतंत्र में अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकता है। संशोधन विधेयकों के पारित होने के बाद प्रदेश में स्थानीय चुनावी राजनीति का परिदृश्य बदलता नजर आ सकता है। अब सबकी निगाहें विधानसभा सत्र पर टिकी हैं, जहां इन विधेयकों को मंजूरी मिलना औपचारिक प्रक्रिया का अगला कदम होगा।

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