राजस्थान में फ्री दवाइयों की खरीद में बड़ी गड़बड़ियों के आरोप, वीडियो में जाने RMSCL के टेंडर में देरी से सरकारी खजाने को नुकसान
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दवाइयां उपलब्ध कराने वाली राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (RMSCL) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। पिछले डेढ़ से दो साल के दौरान दवाइयों की खरीद के टेंडर और उनकी गुणवत्ता जांच में कथित अनियमितताओं का मामला सामने आया है। स्थानीय निधि अंकेक्षण विभाग की ऑडिट में ऐसे कई बिंदु सामने आए हैं, जिनमें रेट कॉन्ट्रैक्ट की अवधि समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक नए टेंडर नहीं किए जाने पर सवाल उठाए गए हैं।ऑडिट के अनुसार, कई मामलों में पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट की अवधि खत्म होने के बाद करीब एक साल तक नए रेट कॉन्ट्रैक्ट प्रभावी नहीं किए गए। इसका असर सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की नियमित आपूर्ति पर पड़ा। आरोप है कि समय पर दवाइयों की खरीद और सप्लाई सुनिश्चित नहीं होने के कारण अस्पतालों को स्थानीय स्तर पर दवाइयां खरीदनी पड़ीं। इससे सरकारी धन के अधिक खर्च होने और वित्तीय नुकसान की आशंका जताई गई है।
रेट कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद भी नए टेंडर में देरी
RMSCL प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के लिए दवाइयों की खरीद और उनकी आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और निर्धारित दरों पर खरीद के माध्यम से सरकारी खर्च को नियंत्रित रखना है।ऑडिट में सामने आए बिंदुओं के मुताबिक, कुछ दवाइयों के रेट कॉन्ट्रैक्ट की अवधि समाप्त होने के बाद नए रेट कॉन्ट्रैक्ट समय पर नहीं किए गए। इससे पुरानी दरों पर केंद्रीय स्तर से दवाइयों की खरीद और आपूर्ति की व्यवस्था प्रभावित हुई।नियमों के अनुसार, मौजूदा रेट कॉन्ट्रैक्ट की अवधि खत्म होने के बाद नए रेट कॉन्ट्रैक्ट प्रभावी होने चाहिए, ताकि खरीद प्रक्रिया में अनावश्यक अंतराल नहीं आए। राजस्थान ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (RTPP) नियमों के प्रावधानों के संदर्भ में भी इस देरी पर सवाल उठाए गए हैं।
अस्पतालों को स्थानीय स्तर पर खरीदनी पड़ीं दवाइयां
दवाइयों की नियमित आपूर्ति प्रभावित होने का सीधा असर अस्पतालों की व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऑडिट में उठाए गए सवालों के मुताबिक, जब कॉरपोरेशन के माध्यम से दवाइयां उपलब्ध नहीं हुईं, तो अस्पतालों ने स्थानीय स्तर पर खरीद की। आरोप है कि इस खरीद में निर्धारित दरों की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ी, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।हालांकि, वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ, किन दवाइयों की खरीद प्रभावित हुई और कितने अस्पतालों को स्थानीय स्तर पर खरीद करनी पड़ी, इसका स्पष्ट आकलन संबंधित ऑडिट रिपोर्ट और विभागीय रिकॉर्ड से ही किया जा सकता है।
दवाइयों की गुणवत्ता जांच भी सवालों के घेरे में
मामले में केवल टेंडर प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि दवाइयों की गुणवत्ता जांच को लेकर भी अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाइयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता जांच से जुड़े मामलों की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी मानी जा रही है।फिलहाल ऑडिट में सामने आए बिंदुओं के आधार पर यह मामला सरकारी खरीद व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही से जुड़ा है। RMSCL की ओर से इन आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण दिया गया है और संबंधित मामलों में क्या कार्रवाई हुई है, इसकी जानकारी सामने आने पर तस्वीर और स्पष्ट होगी।

