धौलपुर में शिक्षकों की भारी कमी, 896 स्वीकृत पदों में 302 खाली; चार सत्रों से अटकी पदोन्नति से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित
धौलपुर जिले में शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर संकट से जूझ रही है। जिले में व्याख्याताओं के कुल 896 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 302 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हुए हैं। शिक्षकों की कमी के चलते स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है और विद्यार्थियों की शिक्षा पर इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है।
नए शिक्षा सत्र की शुरुआत एक अप्रैल से हो चुकी है, लेकिन कई विद्यालयों में विषय विशेषज्ञ व्याख्याताओं की कमी बनी हुई है। ऐसे में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्कूलों में एक-एक शिक्षक को अतिरिक्त कक्षाओं का भार उठाना पड़ रहा है, जिससे शिक्षण कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
सूत्रों के अनुसार, विभाग में पिछले कई वर्षों से पदोन्नति की प्रक्रिया भी अटकी हुई है। चार सत्रों से व्याख्याताओं की पदोन्नति लंबित होने के कारण न केवल खाली पदों की समस्या बढ़ी है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी असंतुलन पैदा हो गया है। शिक्षकों का कहना है कि समय पर पदोन्नति और भर्ती प्रक्रिया पूरी न होने से मनोबल पर भी असर पड़ रहा है।
धौलपुर के शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है और उच्च स्तर पर प्रस्ताव भेजे गए हैं। हालांकि, भर्ती प्रक्रिया में देरी के कारण जमीनी स्तर पर समस्याएं बनी हुई हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि व्याख्याताओं की कमी से छात्रों की पढ़ाई की गति धीमी हो जाती है, विशेषकर उच्च माध्यमिक स्तर पर जहां विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की आवश्यकता अधिक होती है। उनका कहना है कि यदि समय पर नियुक्तियां नहीं की गईं तो इसका असर परीक्षा परिणामों और छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है।
राजस्थान शिक्षा विभाग पर भी सवाल उठ रहे हैं कि लंबे समय से अटकी पदोन्नति और भर्ती प्रक्रिया को समय पर पूरा क्यों नहीं किया जा रहा है। शिक्षकों के संगठनों ने भी मांग की है कि जल्द से जल्द रिक्त पदों को भरा जाए और पदोन्नति प्रक्रिया को गति दी जाए।
स्थानीय अभिभावकों ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में पहले से ही संसाधनों की कमी है, और अब शिक्षकों की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कई अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
फिलहाल स्थिति यह है कि स्कूलों में उपलब्ध शिक्षकों पर अतिरिक्त भार बढ़ता जा रहा है और शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विभागीय स्तर पर समाधान की उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन जमीनी हालात अभी भी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं।

