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आबूरोड छात्रा हत्याकांड में पिता को 10 साल की सजा, फुटेज में देंखे पढ़ाई को लेकर मारपीट से हुई थी बेटी की मौत

आबूरोड छात्रा हत्याकांड में पिता को 10 साल की सजा, फुटेज में देंखे पढ़ाई को लेकर मारपीट से हुई थी बेटी की मौत

राजस्थान के सिरोही जिले के आबूरोड में 11वीं कक्षा की छात्रा मोमिना की मौत के चर्चित मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। अपर सत्र न्यायालय संख्या-1 ने छात्रा के पिता फतेह मोहम्मद को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।यह मामला अप्रैल 2024 में सामने आया था, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। घटना के बाद पुलिस ने जांच कर आरोपी पिता के खिलाफ न्यायालय में आरोप-पत्र पेश किया था।

5 अप्रैल 2024 को दर्ज हुई थी रिपोर्ट

मामले की शुरुआत 5 अप्रैल 2024 को हुई, जब छात्रा के चाचा अकरम ने आबूरोड थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया कि उसके भाई फतेह मोहम्मद ने फोन कर उसे घर बुलाया था।घर पहुंचने पर अकरम ने देखा कि उसकी भतीजी मोमिना घर के फर्श पर अचेत अवस्था में पड़ी हुई थी। इसके बाद उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

पढ़ाई को लेकर हुई थी मारपीट

जांच के दौरान सामने आया कि छात्रा की परीक्षा और पढ़ाई को लेकर पिता और बेटी के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि गुस्से में आकर फतेह मोहम्मद ने बेटी की लकड़ी, थप्पड़ों और मुक्कों से बेरहमी से पिटाई की।मारपीट के कारण मोमिना को गंभीर अंदरूनी चोटें आईं। उसकी हालत बिगड़ने पर परिजन उसे आबूरोड अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।

अदालत ने माना दोषी

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मामले से जुड़े साक्ष्य और गवाह अदालत के समक्ष पेश किए। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी पिता को दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के साधारण कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

इलाके में चर्चा का विषय बना था मामला

यह घटना सामने आने के बाद पूरे आबूरोड क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया था। पढ़ाई को लेकर पिता द्वारा बेटी के साथ कथित मारपीट और उसकी मौत ने समाज में बच्चों के प्रति हिंसक व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

बच्चों के साथ हिंसा पर चिंता

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों पर पढ़ाई का दबाव या अनुशासन के नाम पर शारीरिक हिंसा किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। ऐसे मामलों में संवाद और सकारात्मक व्यवहार ही बेहतर समाधान माना जाता है।अदालत के इस फैसले के साथ बहुचर्चित मामले में कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है।

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