जयपुर की शाही विरासत से जुड़ा 17वीं सदी का दुर्लभ एस्ट्रोलेब लंदन में होगा नीलाम, 29 अप्रैल को लगेगी वैश्विक बोली
राजस्थान की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक धरोहर से जुड़ा 17वीं शताब्दी का विशाल एस्ट्रोलेब (खगोलीय गणना यंत्र) एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। यह दुर्लभ खगोलीय उपकरण, जो कभी जयपुर के शाही संग्रह का हिस्सा रहा है, अब 29 अप्रैल को लंदन में नीलामी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। इसकी वैश्विक बोली प्रसिद्ध नीलामी घर Sotheby's में लगाई जाएगी।
एस्ट्रोलेब को प्राचीन खगोल विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र माना जाता है, जिसका उपयोग समय मापने, तारों और ग्रहों की स्थिति समझने तथा खगोलीय गणनाओं के लिए किया जाता था। 17वीं शताब्दी में यह उपकरण वैज्ञानिक अध्ययन, समुद्री यात्रा और ज्योतिषीय गणनाओं में अहम भूमिका निभाता था। इसकी जटिल बनावट और सटीक गणनात्मक क्षमता इसे उस दौर की सबसे उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों में शामिल करती थी।
जानकारी के अनुसार, यह विशाल एस्ट्रोलेब कभी जयपुर के राजसी संग्रह का हिस्सा रहा है, जो उस समय भारत में विज्ञान और खगोल अध्ययन के प्रमुख केंद्रों में से एक था। जयपुर रियासत ने खगोल विज्ञान और गणित के विकास में विशेष योगदान दिया था, और इसी परंपरा के तहत कई दुर्लभ वैज्ञानिक उपकरणों का संग्रह किया गया था।
नीलामी से पहले इस ऐतिहासिक वस्तु को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासा उत्साह देखा जा रहा है। कला, इतिहास और विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह एस्ट्रोलेब न केवल एक वैज्ञानिक उपकरण है, बल्कि यह उस युग की उन्नत सोच और ज्ञान परंपरा का प्रतीक भी है। इसकी संरचना और निर्माण शैली उस समय के शिल्प कौशल और तकनीकी दक्षता को दर्शाती है।
Sotheby's द्वारा आयोजित इस नीलामी में दुनिया भर के संग्रहकर्ता, निजी खरीदार और संग्रहालय हिस्सा लेने की संभावना रखते हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि इसकी बोली बेहद ऊंचे स्तर तक जा सकती है, क्योंकि ऐसे ऐतिहासिक और दुर्लभ वैज्ञानिक उपकरण अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत कम देखने को मिलते हैं।
इस नीलामी को लेकर भारत में भी चर्चा तेज हो गई है। इतिहासकारों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी विरासत वस्तुएं देश की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिन्हें संरक्षित रखना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि ऐसे उपकरणों का अध्ययन भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकता है।
कई विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस प्रकार की ऐतिहासिक वस्तुओं को वापस भारत लाने के प्रयास किए जा सकते हैं, ताकि वे अपने मूल सांस्कृतिक संदर्भ में सुरक्षित रह सकें। हालांकि फिलहाल यह एस्ट्रोलेब अंतरराष्ट्रीय नीलामी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसके अंतिम खरीदार का इंतजार किया जा रहा है।
29 अप्रैल की यह नीलामी अब केवल एक बिक्री प्रक्रिया नहीं, बल्कि विज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजन बन गई है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

