'कैसी मां है जो बेटे की बलि ले?' धीरेंद्र शास्त्री ने बलि प्रथा पर उठाए सवाल, वीडियो में बोले- जीव में शिव बसे हैं
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने देवी-देवताओं के नाम पर होने वाली बलि प्रथा को लेकर बड़ा बयान दिया है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में उन्होंने कहा कि अगर दुर्गा को बलि लेनी होगी तो वह खुद लेंगी, इंसान किसी जीव की बलि क्यों दे? उन्होंने जीव हिंसा का विरोध करते हुए कहा कि हर जीव को जीने का अधिकार है और जीव में ही शिव का वास है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा, "वह कैसी मां है, जो किसी बेटे की बलि ले? अगर मां दुर्गा को बलि लेनी होगी तो वह खुद लेंगी। तुम क्यों काट रहे हो?" उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था के नाम पर किसी जीव की हत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक, सनातन परंपरा में जीव मात्र में ईश्वर का वास माना गया है, इसलिए जीव हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है।
मांस-मछली खाने वालों को 'पाखंडी' कहने पर हुआ था विवाद
धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल के हावड़ा में नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली खाने को लेकर उनके बयान पर विवाद हो चुका है। उस दौरान उन्होंने मांस और मछली खाने वालों को 'पाखंडी' बताया था। उनके बयान को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई थी।विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि उनकी बातों का अर्थ का अनर्थ निकाला गया। उन्होंने कहा कि वह खुद बंगाली हैं और स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस तथा बामाखेपा को मानने वाले हैं। ऐसे में उनके बयान को बंगाली संस्कृति या वहां के खान-पान के खिलाफ नहीं समझा जाना चाहिए।
'किसी के खाने-पीने और पहनावे पर रोक नहीं'
धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी किसी के खाने-पीने या पहनावे पर रोक लगाने की बात नहीं कही। उनका कहना था कि दुर्गा पूजा के दौरान देवी और पूजा पंडाल के आसपास पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। जिन लोगों को मांस खाना है, वे अपने घर पर खा सकते हैं।उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के भोजन या उसके जीवन जीने के तरीके पर रोक नहीं लगाई जा सकती। धार्मिक गुरु होने के नाते वह जीव हिंसा और बलि प्रथा के खिलाफ जरूर बोलेंगे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह किसी के निजी खान-पान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं।
बलि प्रथा के खिलाफ खुलकर बोले
ग्लासगो में दिए बयान में धीरेंद्र शास्त्री ने एक बार फिर अपना रुख साफ किया कि देवी के नाम पर जीव की बलि देने की परंपरा का वह समर्थन नहीं करते। उनका जोर इस बात पर रहा कि आस्था के साथ करुणा और जीवों के प्रति संवेदना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि ईश्वर हर जीव में मौजूद हैं तो किसी जीव की हत्या को धार्मिक कर्म बताना उचित नहीं हो सकता।

