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‘10 साल से इंतजार... कभी नहीं आया वो गुरुवार’: भोपाल में अपनों से दूर बुजुर्गों का दर्द, बोलीं- अब आश्रम ही सबकुछ

‘10 साल से इंतजार... कभी नहीं आया वो गुरुवार’: भोपाल में अपनों से दूर बुजुर्गों का दर्द, बोलीं- अब आश्रम ही सबकुछ

भोपाल में बुजुर्गों के जीवन का ऐसा दर्द सामने आया है, जो रिश्तों की बदलती तस्वीर दिखाता है। शहर के एक वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के लिए त्योहार, जन्मदिन और खास दिन अब भी उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन कई बार वह उम्मीद इंतजार में बदल जाती है। किसी को वर्षों से बेटे-बेटियों के आने का इंतजार है तो कोई अपने पुराने घर और परिवार की यादों के साथ जिंदगी गुजार रहा है।

ऐसी ही कहानी एक पूर्व फिशरीज डायरेक्टर की पत्नी की है। उन्होंने अपनी जिंदगी के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह लंबे समय से अपने अपनों का इंतजार कर रही हैं। उनका कहना है कि अब आश्रम ही उनके लिए घर और परिवार बन चुका है।

10 साल से इंतजार

वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग महिला ने भावुक होते हुए बताया कि वह करीब 10 साल से एक खास दिन का इंतजार करती रही हैं। उन्हें उम्मीद रहती थी कि शायद किसी गुरुवार को उनके अपने उनसे मिलने आएंगे, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।

समय बीतता गया और इंतजार धीरे-धीरे आदत बन गया। अब उनकी जिंदगी में आश्रम के दूसरे बुजुर्ग और वहां का स्टाफ ही परिवार जैसा बन गया है।

उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ सबसे ज्यादा जरूरत साथ और अपनापन की होती है। पैसा और सुविधाएं अपनी जगह हैं, लेकिन अपनों का साथ न मिलना बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी कमी बन जाता है।

‘आश्रम ही अब सबकुछ’

बुजुर्ग महिला ने कहा कि अब आश्रम ही उनके लिए सबकुछ है। यहां रहने वाले लोग एक-दूसरे का दुख समझते हैं और जरूरत के समय साथ खड़े होते हैं।

वृद्धाश्रम में रहने वाले कई बुजुर्गों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। किसी के बच्चे विदेश में हैं, किसी के बच्चे दूसरे शहरों में रहते हैं और कुछ बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्हें परिवार ने ही अपने से दूर कर दिया।

ऐसे में आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। त्योहारों पर साथ बैठना, बातचीत करना और एक-दूसरे की मदद करना उनके लिए परिवार जैसा अनुभव बन जाता है।

अपनों की याद आज भी कायम

बुजुर्गों का कहना है कि भले ही वे आश्रम में रहने के आदी हो गए हों, लेकिन अपने बच्चों और परिवार की याद कभी खत्म नहीं होती। कोई फोन कर दे या अचानक मिलने आ जाए तो उनके चेहरे पर खुशी साफ दिखाई देती है।

कई बुजुर्ग अब भी अपने बच्चों के आने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उन्हें शिकायत से ज्यादा इस बात का दुख है कि जिन बच्चों को उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा दिया, वही आज उनसे दूर हैं।

समाज के लिए संदेश

वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की कहानियां समाज के लिए भी एक संदेश हैं। बुजुर्गों को सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि सम्मान, समय और भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।

बुजुर्गों का अकेलापन कई बार उनकी सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। ऐसे में परिवार के लोगों को चाहिए कि वे अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय अपने माता-पिता और बुजुर्ग परिजनों के लिए जरूर निकालें।

भोपाल के इस वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की जिंदगी भले ही अब आश्रम से जुड़ गई है, लेकिन उनके दिल में अपनों के लिए जगह आज भी बनी हुई है। ‘10 साल से इंतजार... कभी नहीं आया वो गुरुवार’ जैसे शब्द सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम बुजुर्गों के दर्द को बयां करते हैं, जो उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनों के साथ के लिए तरस रहे हैं।

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