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भोपाल में कृष्ण भक्ति के अनोखे रंग: कहीं बाल-गोपाल बनकर माखन खाते हैं ठाकुरजी, तो कहीं राजसी वैभव में विराजते हैं द्वारकाधीश

भोपाल में कृष्ण भक्ति के अनोखे रंग: कहीं बाल-गोपाल बनकर माखन खाते हैं ठाकुरजी, तो कहीं राजसी वैभव में विराजते हैं द्वारकाधीश

श्रीकृष्ण का जीवन जितनी विविधताओं का महासागर है, उतनी ही अनूठी उनकी उपासना पद्धतियां भी हैं। भगवान कृष्ण को कहीं नटखट बालक के रूप में पूजा जाता है, तो कहीं वे धर्म की रक्षा करने वाले योद्धा और द्वारका के राजा के रूप में भक्तों के आराध्य हैं। राजधानी भोपाल में भी कृष्ण भक्ति के ऐसे ही अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। यहां ठाकुरजी की पूजा किसी एक तय परंपरा या ढर्रे तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग संप्रदायों और मंदिरों में उनके स्वरूप के अनुसार सेवा, श्रृंगार और भोग की परंपराएं निभाई जाती हैं।

भोपाल में पुष्टिमार्गीय परंपरा के मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण को लाड़ले बाल-गोपाल के रूप में देखा जाता है। यहां ठाकुरजी के प्रति भक्तों का भाव भगवान और भक्त से अधिक माता-पिता और बालक जैसा दिखाई देता है। बाल स्वरूप में विराजे कृष्ण को प्रतिदिन अलग-अलग समय पर भोग लगाया जाता है। माखन, मिश्री और अन्य प्रिय व्यंजनों से उनका भोग सजाया जाता है। बाल गोपाल के लिए वस्त्र और श्रृंगार भी विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। सेवा की इस परंपरा में भगवान को जगाने से लेकर उन्हें भोजन कराने और शयन कराने तक की पूरी दिनचर्या को बेहद आत्मीयता के साथ निभाया जाता है।

वहीं दूसरी ओर भोपाल के द्वारकाधीश मंदिर में भगवान कृष्ण का स्वरूप अधिक राजसी और वैभवपूर्ण दिखाई देता है। यहां वे द्वारका के राजा और धर्म की रक्षा करने वाले भगवान के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर में होने वाले श्रृंगार, वस्त्र, आभूषण और पूजा पद्धति में भी इसी राजसी भाव की झलक मिलती है। भक्त भगवान के दर्शन राजा के दरबार में विराजे आराध्य के रूप में करते हैं।

चारभुजा मंदिर में भी भगवान के प्रति भक्ति का एक अलग ही स्वरूप देखने को मिलता है। यहां कृष्ण के साथ उनके व्यापक विष्णु स्वरूप और धर्मरक्षक भाव को महत्व दिया जाता है। पूजा-अर्चना में वैदिक और पारंपरिक विधियों का समावेश दिखाई देता है। यही वजह है कि एक ही शहर में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के इतने अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।

जन्माष्टमी के अवसर पर इन मंदिरों की रौनक और भी बढ़ जाती है। कहीं बाल कृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारी होती है, तो कहीं राजसी श्रृंगार और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिरों में आकर्षक झांकियां सजाई जाती हैं और आधी रात को भगवान के जन्म के समय विशेष आरती और भोग लगाया जाता है।

भोपाल की कृष्ण भक्ति की खासियत यही है कि यहां भक्त अपने आराध्य को केवल भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अलग-अलग भावों में महसूस करते हैं। किसी के लिए वे घर के नन्हे बालक हैं, किसी के लिए राजा, तो किसी के लिए धर्म की रक्षा करने वाले योद्धा। यही विविधता श्रीकृष्ण की भक्ति को और भी व्यापक और जीवंत बनाती है।

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