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ढाई साल की बेटी को पेट की समस्या थी, डॉक्टर ने पानी में रखने को कहा; नर्मदा में नहलाते-नहलाते पिता ने सीखी तैराकी और अब दूसरों को दे रहे ट्रेनिंग

ढाई साल की बेटी को पेट की समस्या थी, डॉक्टर ने पानी में रखने को कहा; नर्मदा में नहलाते-नहलाते पिता ने सीखी तैराकी और अब दूसरों को दे रहे ट्रेनिंग

नर्मदापुरम में एक पिता की कहानी इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रही है। ढाई साल की बेटी को पेट से जुड़ी समस्या हुई तो डॉक्टर ने शरीर को ठंडक देने के लिए कुछ देर पानी में रखने या स्विमिंग कराने की सलाह दी। पिता अपनी बेटी को लेकर नर्मदापुरम के विवेकानंद घाट पहुंचे और रोज मां नर्मदा का नाम लेकर उसे पानी में नहलाने लगे। उस समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि बेटी को पानी में उतारने का यह सिलसिला आगे चलकर उनकी जिंदगी की नई दिशा बन जाएगा।

पिता के अनुसार, बेटी की तबीयत को लेकर परिवार चिंतित था। डॉक्टर की सलाह के बाद उन्होंने उसे पानी में रखने का फैसला किया। शुरुआत में वह बेटी को लेकर घाट पर जाते और पानी में उसे कुछ देर नहलाते थे। धीरे-धीरे बेटी का पानी के प्रति डर कम होने लगा और पिता भी उसके साथ पानी में रहने लगे।

नर्मदा के पानी में लगातार समय बिताने के दौरान पिता ने तैराकी सीखने की कोशिश शुरू की। शुरुआत में उनका उद्देश्य केवल बेटी की देखभाल करना था, लेकिन धीरे-धीरे पानी में उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। उन्होंने तैराकी की तकनीक सीखी और नदी में सुरक्षित तरीके से तैरने का अभ्यास किया।

समय के साथ यह अभ्यास उनकी पहचान बन गया। जिस विवेकानंद घाट पर वह कभी अपनी छोटी बेटी को पानी में नहलाने के लिए लेकर आते थे, वहीं अब वह दूसरे लोगों को तैराकी सिखाने लगे हैं। वह लोगों को पानी में उतरने से पहले सुरक्षा के जरूरी नियमों की जानकारी भी देते हैं।

उनकी कहानी में बेटी से जुड़ा वह दौर आज भी खास है। पिता का कहना है कि उस समय वह केवल अपनी बेटी की परेशानी दूर करने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें अंदाजा नहीं था कि नर्मदा नदी के घाट पर शुरू हुआ यह सफर उन्हें तैराकी से जोड़ देगा और आगे चलकर वह दूसरों को भी तैरना सिखाने लगेंगे।

विवेकानंद घाट पर तैराकी सीखने आने वाले लोगों के लिए उनका अनुभव उपयोगी साबित होता है। वह शुरुआती लोगों को पानी में संतुलन बनाए रखने, सांस लेने और धीरे-धीरे तैरने की तकनीक समझाते हैं। साथ ही नदी में तैराकी के दौरान सावधानी बरतने पर भी जोर देते हैं।

बेटी के इलाज से जुड़ी एक साधारण कोशिश से शुरू हुई यह कहानी अब तैराकी सिखाने तक पहुंच गई है। पिता के लिए नर्मदा सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि उनके जीवन में बदलाव की वजह बनी जगह भी है। जिस घाट पर कभी वह अपनी ढाई साल की बेटी को लेकर पहुंचे थे, आज वहीं से उनकी पहचान एक तैराकी प्रशिक्षक के रूप में बन गई है।

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