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भोपाल में पटवारियों के तबादला आदेश 24 घंटे में बदले, प्रशासनिक निर्णय पर उठे सवाल

भोपाल में पटवारियों के तबादला आदेश 24 घंटे में बदले, प्रशासनिक निर्णय पर उठे सवाल

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में पटवारियों के तबादलों को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। यहां 15 जून को जारी स्थानांतरण आदेश महज 24 घंटे के भीतर ही बदल दिए गए, जिससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार, पहले जारी सूची में उन पटवारियों को शामिल किया गया था, जो लंबे समय से एक ही तहसील में पदस्थ थे। नियमों के तहत लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों के तबादले को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाता है। इसी आधार पर कई पटवारियों को हटाकर नई जगहों पर पदस्थ करने का आदेश जारी किया गया था।

हालांकि, आदेश जारी होने के अगले ही दिन नई सूची सामने आ गई, जिसमें पहले वाली सूची के कई नामों में बदलाव कर दिए गए। बताया जा रहा है कि करीब आधे से अधिक पटवारियों के स्थानांतरण आदेश या तो संशोधित कर दिए गए या फिर उन्हें सूची से बाहर कर दिया गया। अचानक हुए इस बदलाव से न केवल प्रभावित कर्मचारी बल्कि प्रशासनिक महकमा भी हैरान रह गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि तबादला सूची में बदलाव किसी दबाव या पुनः समीक्षा के कारण किया गया, हालांकि इस पर आधिकारिक तौर पर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है।

सूत्रों के मुताबिक, प्रारंभिक सूची तैयार करने के बाद कुछ स्तर पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं, जिसके बाद सूची को दोबारा संशोधित किया गया। लेकिन इतने कम समय में बड़े पैमाने पर बदलाव होने से पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

वहीं, जिन पटवारियों के नाम सूची में पहले शामिल थे और बाद में हट गए, उनमें असंतोष की स्थिति देखी जा रही है। कई कर्मचारियों का कहना है कि पहले आदेश के अनुसार उन्होंने स्थानांतरण की तैयारी भी शुरू कर दी थी, लेकिन अचानक आदेश बदलने से स्थिति असमंजसपूर्ण हो गई है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह बार-बार आदेशों में बदलाव से न केवल कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।

फिलहाल इस मामले में जिला प्रशासन की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सभी की नजर अब इस बात पर है कि क्या इस पूरे प्रकरण की कोई समीक्षा होगी या इसे सामान्य प्रशासनिक संशोधन मानकर मामला खत्म कर दिया जाएगा।

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