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जनसुनवाई में छलका 16 साल का दर्द: पाई-पाई जोड़कर प्लॉट खरीदा, अब तक कब्जे के लिए भटक रहीं कमला

जनसुनवाई में छलका 16 साल का दर्द: पाई-पाई जोड़कर प्लॉट खरीदा, अब तक कब्जे के लिए भटक रहीं कमला

जनसुनवाई में मंगलवार को एक महिला ने अपनी 16 साल पुरानी परेशानी अधिकारियों के सामने रखी। कमला नाम की महिला ने बताया कि उन्होंने पाई-पाई जोड़कर प्लॉट खरीदा था, लेकिन जमीन पर कब्जा पाने के लिए उन्हें वर्षों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। लंबे समय से समस्या का समाधान नहीं होने के कारण वह एक बार फिर जनसुनवाई में अपनी शिकायत लेकर पहुंचीं।

कमला का कहना है कि मेहनत की कमाई से प्लॉट खरीदने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अपना घर बनाने का सपना जल्द पूरा होगा। लेकिन जमीन पर कब्जे को लेकर विवाद और प्रशासनिक प्रक्रिया के चलते यह सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है।

16 साल से लगा रहीं दफ्तरों के चक्कर

महिला के अनुसार, प्लॉट खरीदने के बाद से ही वह संबंधित अधिकारियों से शिकायत करती आ रही हैं। कई बार आवेदन देने और अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। हर बार कार्रवाई का भरोसा मिलने के बाद भी जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका।

कमला ने जनसुनवाई में अधिकारियों को अपनी पूरी समस्या बताई और मामले में तत्काल कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ लगातार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना मुश्किल हो रहा है।

पाई-पाई जोड़कर खरीदी थी जमीन

कमला ने बताया कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई और बचत से पाई-पाई जोड़कर प्लॉट खरीदा था। जमीन खरीदते समय उन्हें उम्मीद थी कि भविष्य में इसी जगह अपना घर बना सकेंगी। लेकिन 16 साल बीत जाने के बाद भी वह अपने प्लॉट का उपयोग नहीं कर पा रही हैं।

महिला ने प्रशासन से अपील की कि मामले की जांच कर उन्हें उनके प्लॉट पर कब्जा दिलाया जाए, ताकि वर्षों से चली आ रही परेशानी खत्म हो सके।

जनसुनवाई में अधिकारियों से कार्रवाई की मांग

जनसुनवाई का उद्देश्य आम लोगों की समस्याओं को सीधे अधिकारियों तक पहुंचाकर उनका समाधान कराना है। कमला का मामला भी इसी उम्मीद के साथ अधिकारियों के सामने रखा गया। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस शिकायत पर कितनी जल्दी कार्रवाई करता है और महिला को उसके प्लॉट का कब्जा कब तक मिल पाता है।

16 साल से न्याय और अपने हक की जमीन के लिए संघर्ष कर रहीं कमला की शिकायत ने जनसुनवाई में प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है।

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