Samachar Nama
×

शराब से हजारों करोड़ कमाने वाली MP सरकार अपनी ही नीति से देसी शराब खरीदने में ज्यादा खर्च कर रही

शराब से हजारों करोड़ कमाने वाली MP सरकार अपनी ही नीति से देसी शराब खरीदने में ज्यादा खर्च कर रही

मध्य प्रदेश सरकार शराब से हर साल हजारों करोड़ रुपए का राजस्व जुटाती है, लेकिन अब देसी शराब की खरीद को लेकर सरकार की अपनी ही नीति पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सरकारी नीति के चलते देसी शराब की खरीद में प्रदेश सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे एक तरफ सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ शराब कारोबार से जुड़े नियमों और खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकारी खरीद व्यवस्था पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश में शराब की बिक्री से सरकार को बड़ी मात्रा में आबकारी राजस्व प्राप्त होता है। देसी शराब की आपूर्ति के लिए सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के तहत लाइसेंसधारी कंपनियों और निर्माताओं से शराब खरीदी जाती है। इसी खरीद प्रक्रिया में लागू नीति को लेकर अब सवाल उठाया जा रहा है।

आरोप है कि सरकार द्वारा तय व्यवस्था के कारण देसी शराब के लिए ऐसी कीमत चुकानी पड़ रही है, जो बाजार की परिस्थितियों और उत्पादन लागत के मुकाबले अधिक है। यदि खरीद प्रक्रिया में कीमतों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए तो सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को कम किया जा सकता है।

हजारों करोड़ के अतिरिक्त खर्च का दावा

नीति के कारण सरकार को कितनी अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ रही है, इसका वास्तविक आंकड़ा विस्तृत वित्तीय और आबकारी रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। हालांकि उपलब्ध दावे में यह राशि हजारों करोड़ रुपए बताई जा रही है। ऐसे में मामला केवल शराब की खरीद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकारी वित्तीय प्रबंधन से भी जुड़ जाता है।

अगर वास्तव में सरकार समान गुणवत्ता और मानकों वाली देसी शराब के लिए अन्य राज्यों या बाजारों की तुलना में अधिक कीमत चुका रही है, तो खरीद नीति में बदलाव की जरूरत पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।

नीति में बदलाव से बच सकती है बड़ी रकम

सरकार के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य के बजट में बड़ा योगदान देता है। यदि शराब की खरीद पर अनावश्यक अतिरिक्त खर्च हो रहा है, तो कीमत निर्धारण और आपूर्ति व्यवस्था में सुधार करके बड़ी रकम बचाई जा सकती है।

इसके लिए देसी शराब की उत्पादन लागत, निर्माता की कीमत, परिवहन खर्च, टैक्स और सरकार द्वारा तय खरीद मूल्य का स्वतंत्र ऑडिट कराया जा सकता है। साथ ही दूसरे राज्यों में लागू खरीद मॉडल से भी तुलना की जा सकती है।

पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देसी शराब की खरीद कीमत तय करने के लिए सरकार की नीति में कौन से मानक लागू हैं और क्या समय-समय पर इन कीमतों की समीक्षा की जाती है। यदि लंबे समय से कीमतों की समीक्षा नहीं हुई है तो बदलती उत्पादन लागत और बाजार परिस्थितियों के अनुसार नीति में संशोधन किया जाना जरूरी हो सकता है।

वहीं यदि सरकार के पास मौजूदा कीमतों को उचित ठहराने के पर्याप्त कारण हैं, तो उसे सार्वजनिक रूप से खरीद प्रक्रिया और लागत का विवरण सामने रखना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि हजारों करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च का दावा कितना सही है।

फिलहाल देसी शराब की खरीद नीति को लेकर उठे सवालों ने मध्य प्रदेश सरकार की आबकारी व्यवस्था और वित्तीय प्रबंधन पर बहस छेड़ दी है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार इस नीति की समीक्षा करती है या मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखती है।

Share this story

Tags