Samachar Nama
×

ग्वालियर की खादी से लाल किले तक तिरंगे का सफर, 1930 में चरखे से शुरू हुई कहानी अब 18 राज्यों तक पहुंची

ग्वालियर की खादी से लाल किले तक तिरंगे का सफर, 1930 में चरखे से शुरू हुई कहानी अब 18 राज्यों तक पहुंची

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का ग्वालियर से एक खास रिश्ता रहा है। ग्वालियर की खादी से तैयार होने वाले तिरंगे का सफर करीब 90 साल से भी ज्यादा पुराना है। वर्ष 1930 में चरखे से शुरू हुई यह कहानी आज देश के 18 राज्यों तक पहुंच चुकी है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर ग्वालियर की खादी से बने तिरंगे देशभर में शान से लहराते हैं।

ग्वालियर की खादी से तैयार तिरंगे को गुणवत्ता और परंपरा के लिए खास पहचान मिली है। यहां तैयार होने वाला राष्ट्रीय ध्वज केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि देश की आजादी, संघर्ष और गौरव का प्रतीक माना जाता है।

1930 में चरखे से हुई शुरुआत

ग्वालियर में खादी से तिरंगा तैयार करने की शुरुआत वर्ष 1930 के आसपास हुई थी। उस समय चरखे से सूत तैयार कर हाथ से कपड़ा बुना जाता था। धीरे-धीरे यही परंपरा आगे बढ़ी और ग्वालियर खादी से तैयार तिरंगे की पहचान देशभर में बनने लगी।

आज भी तिरंगे को तैयार करने की प्रक्रिया में खादी और हस्तशिल्प की परंपरा का विशेष ध्यान रखा जाता है। ध्वज निर्माण में गुणवत्ता, रंग और आकार से जुड़े निर्धारित मानकों का पालन किया जाता है।

लाल किले तक पहुंचा ग्वालियर का तिरंगा

ग्वालियर की खादी से तैयार तिरंगा देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय आयोजनों तक पहुंच चुका है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर पर फहराए जाने वाले तिरंगे से लेकर विभिन्न सरकारी संस्थानों तक इसका उपयोग किया जाता है।

यह तिरंगा देश के गौरव और सम्मान से जुड़ा होने के कारण विशेष महत्व रखता है। ग्वालियर में तैयार होने वाला ध्वज अब देश के कई हिस्सों में अपनी पहचान बना चुका है।

18 राज्यों में पहुंच रहा राष्ट्रीय ध्वज

ग्वालियर की खादी से तैयार तिरंगे की मांग अब देश के 18 राज्यों तक पहुंच गई है। राष्ट्रीय पर्वों के दौरान बड़ी संख्या में लोग और संस्थान यहां से तैयार ध्वज मंगवाते हैं।

तिरंगा निर्माण से जुड़े कारीगरों के लिए यह काम केवल रोजगार नहीं, बल्कि देश सेवा का माध्यम भी है। वे पूरी सावधानी और सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज तैयार करते हैं।

खादी और तिरंगे का भावनात्मक जुड़ाव

महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ी खादी का तिरंगे के साथ गहरा संबंध रहा है। खादी आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रही है। यही कारण है कि खादी से तैयार तिरंगे को विशेष सम्मान दिया जाता है।

ग्वालियर की खादी से बना तिरंगा आज भी देशभक्ति की भावना को मजबूत करता है। चरखे से शुरू हुआ यह सफर अब देश के अलग-अलग राज्यों तक पहुंच चुका है और हर साल लाखों लोगों के हाथों में नजर आता है।

Share this story

Tags