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सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, वरिष्ठ अधिवक्ता अपनी मर्जी से किसी पक्षकार की ओर से पेश नहीं हो सकते

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, वरिष्ठ अधिवक्ता अपनी मर्जी से किसी पक्षकार की ओर से पेश नहीं हो सकते

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं की पेशी को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वरिष्ठ अधिवक्ता किसी पक्षकार पर अपनी पेशी थोप नहीं सकता। उसकी उपस्थिति केवल संबंधित पक्ष के ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ (AOR) के माध्यम से और उनके निर्देशों के आधार पर ही दर्ज की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि न्यायालय में किसी मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता की भूमिका नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है। वह सीधे तौर पर किसी पक्षकार की ओर से अपनी पेशी दर्ज नहीं करा सकते, जब तक कि संबंधित एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की सहमति और निर्देश न हों।

AOR की भूमिका को बताया महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की भूमिका को अहम बताया। अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में किसी भी मामले में पक्षकार की ओर से आधिकारिक रूप से पेश होने और दस्तावेज दाखिल करने की जिम्मेदारी AOR की होती है।

वरिष्ठ अधिवक्ता आमतौर पर कानूनी दलीलें रखने और महत्वपूर्ण मामलों में विशेषज्ञ सलाह देने के लिए नियुक्त किए जाते हैं, लेकिन उनकी पेशी भी न्यायालय के नियमों के अनुसार ही होती है। वे AOR की व्यवस्था को नजरअंदाज कर सीधे किसी पक्षकार के लिए उपस्थित नहीं हो सकते।

पेशी दर्ज कराने को लेकर दिया निर्देश

पीठ ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता की पेशी तभी दर्ज की जा सकती है, जब वह संबंधित पक्ष के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के माध्यम से हो और उन्हें मामले में पेश होने का निर्देश दिया गया हो।

अदालत की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट में वकालत की प्रक्रिया और पेशेवर अनुशासन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायालय की निर्धारित प्रक्रिया का पालन सभी वकीलों को करना होगा, चाहे उनका अनुभव और पद कितना भी बड़ा क्यों न हो।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए भी नियम समान

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि न्यायालय में सभी अधिवक्ताओं को नियमों का पालन करना होता है। वरिष्ठ अधिवक्ता होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति प्रक्रिया से अलग जाकर किसी मामले में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है।

अदालत ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में हर भूमिका की अपनी जिम्मेदारी तय है। AOR पक्षकार और अदालत के बीच आधिकारिक माध्यम होता है, इसलिए उसकी सहमति और निर्देश के बिना वरिष्ठ अधिवक्ता की पेशी दर्ज नहीं की जा सकती।

वकालत प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता और अनुशासन बनाए रखने की दिशा में देखा जा रहा है। अदालत का मानना है कि तय प्रक्रिया का पालन होने से मामलों की सुनवाई अधिक व्यवस्थित तरीके से हो सकती है।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी अपनी पेशी के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। किसी पक्षकार की ओर से पेश होने का अधिकार केवल इच्छा या वरिष्ठता के आधार पर नहीं मिल सकता, बल्कि इसके लिए संबंधित प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश की शीर्ष अदालत में वकालत की प्रक्रिया और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की संवैधानिक भूमिका को और स्पष्ट करती है।

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