बांझपन से जूझ रही महिलाओं में तनाव 60% तक ज्यादा, कामकाजी लोगों की मानसिक सेहत पर भी असर; डिप्रेशन से घट सकती है कार्यक्षमता
मानसिक स्वास्थ्य आज एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। बांझपन से जूझ रही महिलाओं को शारीरिक और सामाजिक चुनौतियों के साथ मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ सकता है। वहीं, कामकाजी लोगों में डिप्रेशन और चिंता का असर उनके व्यक्तिगत जीवन के साथ काम करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को समय रहते पहचानना और जरूरत पड़ने पर मदद लेना बेहद जरूरी है।
बांझपन से जूझ रही महिलाओं में मानसिक तनाव का खतरा ज्यादा
बीएमजे ओपन में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि बांझपन का सामना कर रही महिलाओं में सामान्य आबादी की तुलना में मनोवैज्ञानिक तनाव का जोखिम लगभग 60 प्रतिशत अधिक था। अध्ययन में चिंता का जोखिम भी करीब 60 प्रतिशत और डिप्रेशन का जोखिम लगभग 40 प्रतिशत अधिक पाया गया।
बांझपन के दौरान महिलाओं को इलाज की लंबी प्रक्रिया, आर्थिक दबाव, परिवार और समाज की अपेक्षाओं तथा भविष्य को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। कई बार सामाजिक टिप्पणियां और बार-बार इलाज कराने का दबाव भी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।
भारत में एम्स से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में बांझपन से जूझ रही 150 महिलाओं का आकलन किया गया था। इसमें 58 प्रतिशत महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए, जबकि 24 प्रतिशत में चिंता के लक्षण दर्ज किए गए। हालांकि, यह एक अस्पताल आधारित अध्ययन था, इसलिए इसके आंकड़ों को देश की सभी महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता।
कामकाजी लोगों की मानसिक सेहत भी चिंता का विषय
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2023 में दुनिया भर में कामकाजी उम्र के लगभग 16 प्रतिशत वयस्क किसी मानसिक विकार से प्रभावित थे। संगठन ने अत्यधिक काम का बोझ, नौकरी की असुरक्षा, भेदभाव और कार्यस्थल पर असमानता को मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करने वाले कारकों में शामिल किया है। भारत के कॉल सेंटरों में काम करने वाले 2,698 लोगों पर आधारित एक अध्ययन में महिलाओं के 23 प्रतिशत और पुरुषों के 17 प्रतिशत प्रतिभागियों ने डिप्रेशन या चिंता अथवा दोनों के लक्षण बताए। यह अध्ययन विशेष क्षेत्र के कर्मचारियों पर आधारित था, इसलिए इसके नतीजे सभी कामकाजी लोगों की स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
डिप्रेशन से काम करने की क्षमता पर असर
डिप्रेशन के कारण एकाग्रता, निर्णय लेने की क्षमता, ऊर्जा और काम में रुचि प्रभावित हो सकती है। इससे काम पूरा करने में अधिक समय लगना, गलतियां बढ़ना और उत्पादकता कम होना जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
हालांकि, कार्यक्षमता में 50 प्रतिशत तक कमी का आंकड़ा किस विशेष अध्ययन से आया है, इसकी पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी। इसलिए इस आंकड़े को सभी डिप्रेशन से प्रभावित कर्मचारियों पर लागू नहीं माना जाना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव व्यक्ति की स्थिति, लक्षणों की गंभीरता और उपलब्ध उपचार पर निर्भर करता है।
मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें
लगातार उदासी, चिंता, नींद में बदलाव, थकान या रोजमर्रा के कामों में रुचि कम होने जैसे लक्षण बने रहें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है। बांझपन के इलाज के दौरान काउंसलिंग और परिवार का सहयोग भी मददगार हो सकता है।
कार्यस्थलों पर कर्मचारियों को सहयोगपूर्ण वातावरण, उचित काम का बोझ और जरूरत के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को कमजोरी समझने के बजाय समय पर पहचानना और उनका उचित उपचार कराना जरूरी है।

