42 साल पहले संन्यास ले चुकी ननद को भी बनाया दहेज प्रताड़ना केस में आरोपी, कोर्ट ने हटाए आरोप
दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए 42 साल पहले संन्यास ले चुकी ननद के खिलाफ लगाए गए आरोपों को हटा दिया। मामले में जेठ और जेठानी को भी आरोपी बनाया गया था, जबकि वे शादी में शामिल तक नहीं हुए थे। अदालत ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद आरोपों को लेकर राहत दी।
मामला एक विवाहिता की ओर से दर्ज कराए गए दहेज प्रताड़ना से संबंधित केस से जुड़ा है। शिकायत में ससुराल पक्ष के कई लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें ऐसी ननद भी शामिल थी, जो घटना से करीब 42 साल पहले ही संन्यास ले चुकी थी। इसके अलावा जेठ और जेठानी पर भी आरोप लगाए गए थे, जबकि बताया गया कि दोनों विवाह समारोह में मौजूद ही नहीं थे।
अदालत के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान आरोपों और संबंधित पक्षों की भूमिका की जांच की गई। कोर्ट ने पाया कि आरोपों को सभी रिश्तेदारों पर एक समान तरीके से लगाया गया था, जबकि उनके खिलाफ विशिष्ट भूमिका या ठोस तथ्य स्पष्ट नहीं किए गए थे।
संन्यास ले चुकी ननद के मामले में अदालत ने विशेष रूप से परिस्थितियों को ध्यान में रखा। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वह लंबे समय पहले संन्यास ले चुकी थी। ऐसे में उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना में सक्रिय भूमिका के आरोपों को लेकर पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।
इसी तरह जेठ और जेठानी के संबंध में भी यह तथ्य सामने आया कि वे विवाह समारोह में शामिल नहीं हुए थे। अदालत ने मामले के रिकॉर्ड और आरोपों की प्रकृति का परीक्षण करने के बाद उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को जारी रखने का आधार नहीं पाया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में केवल रिश्तेदारी के आधार पर परिवार के प्रत्येक सदस्य को आरोपी बनाना उचित नहीं है। आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप बनाए रखने के लिए उसकी भूमिका से जुड़े ठोस और विशिष्ट आरोप होना जरूरी है।
कोर्ट के इस फैसले से उन मामलों में महत्वपूर्ण संदेश गया है, जिनमें दहेज प्रताड़ना के विवाद में पति के साथ उसके दूर के रिश्तेदारों को भी आरोपी बना दिया जाता है। अदालत ने तथ्यों और प्रत्येक आरोपी की वास्तविक भूमिका के आधार पर मामले को देखने की जरूरत पर जोर दिया।
फैसले के बाद 42 साल पहले संन्यास ले चुकी ननद समेत उन आरोपियों को राहत मिली है, जिनके खिलाफ पर्याप्त आधार नहीं पाया गया। अदालत की टिप्पणी ने यह भी स्पष्ट किया कि रिश्तेदारी मात्र किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में आरोपी बनाए रखने का आधार नहीं हो सकती।

