हिंसा झेलने वाली महिलाओं का चुप रहना असामान्य नहीं, घटना की रिपोर्ट न कर पाना आम प्रतिक्रिया: अदालत
एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामलों में पीड़िता के व्यवहार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं का घटना के बाद चुप रहना कोई अपवाद नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में कई महिलाएं घटना की तुरंत रिपोर्ट नहीं कर पातीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला द्वारा हिंसा की जानकारी तुरंत पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति को न देना अपने आप में ऐसा आधार नहीं माना जाना चाहिए, जिससे उसकी शिकायत या उसके साथ हुई घटना पर संदेह किया जाए। अदालत के मुताबिक, हिंसा के बाद चुप्पी साध लेना या रिपोर्ट करने में देरी होना कई पीड़िताओं की सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है।
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में पीड़िता के व्यवहार को समझने के महत्व को रेखांकित करती है। हिंसा के बाद डर, दबाव या अन्य परिस्थितियों के कारण महिला तुरंत सामने नहीं आ सकती। इसलिए केवल शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के आधार पर मामले को अलग नजर से देखना उचित नहीं हो सकता।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में पीड़िता के व्यवहार का आकलन करते समय वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखना जरूरी है। किसी घटना की तत्काल रिपोर्ट न होना अपने आप में घटना के गलत होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।अदालत की इस टिप्पणी को महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में पीड़िताओं की प्रतिक्रिया को लेकर बनी धारणाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

