एक अंक से फेल मेडिकल छात्र ने मांगा ग्रेस मार्क:हाईकोर्ट ने कहा-ग्रेस मार्क्स देना कानूनी आधार नहीं; एनाटॉमी विषय का है छात्र
एक अंक से मेडिकल परीक्षा में फेल हुए छात्र ने हाईकोर्ट से ग्रेस मार्क्स देने की मांग की, लेकिन कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मामला एनाटॉमी विषय की परीक्षा से जुड़ा है। छात्र का कहना था कि वह महज एक अंक की कमी के कारण परीक्षा में सफल नहीं हो सका, इसलिए उसे ग्रेस मार्क्स देकर पास किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि केवल एक अंक से फेल होने के आधार पर ग्रेस मार्क्स देने का कोई स्वतः कानूनी अधिकार नहीं बनता।
जानकारी के अनुसार, मेडिकल छात्र ने एनाटॉमी विषय की परीक्षा दी थी। परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद छात्र को पता चला कि वह निर्धारित न्यूनतम अंक से एक अंक पीछे रह गया है। इसके बाद छात्र ने संबंधित प्राधिकरण के समक्ष ग्रेस मार्क्स देने की मांग रखी। मांग स्वीकार नहीं होने पर उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिका में छात्र की ओर से दलील दी गई कि वह पासिंग मार्क्स के बेहद करीब है और यदि उसे एक अतिरिक्त अंक दे दिया जाए तो वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाएगा। छात्र की ओर से कोर्ट से राहत देने की मांग की गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ग्रेस मार्क्स से जुड़े नियमों और विश्वविद्यालय की परीक्षा व्यवस्था पर विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रेस मार्क्स देना तभी संभव है, जब संबंधित नियमों या विनियमों में उसका प्रावधान हो। महज एक अंक से फेल होने की वजह से अदालत किसी छात्र को अतिरिक्त अंक देने का आदेश नहीं दे सकती।
कोर्ट ने यह भी माना कि परीक्षा में निर्धारित न्यूनतम अंक हासिल करना छात्र की जिम्मेदारी है। यदि किसी नियम के तहत ग्रेस मार्क्स देने की व्यवस्था नहीं है, तो अदालत अपने स्तर पर अतिरिक्त अंक देकर परीक्षा परिणाम बदलने का निर्देश नहीं दे सकती।
एनाटॉमी मेडिकल शिक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय है और मेडिकल पाठ्यक्रम में इसे अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। ऐसे में परीक्षा में निर्धारित मानकों और न्यूनतम अंक संबंधी नियमों का पालन करना जरूरी है।
हाईकोर्ट के इस रुख के बाद छात्र को फिलहाल ग्रेस मार्क्स के आधार पर पास होने की राहत नहीं मिली। कोर्ट ने यह संकेत दिया कि परीक्षा परिणाम से जुड़े मामलों में नियमों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
यह मामला उन विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो परीक्षा में मामूली अंकों से असफल होने के बाद ग्रेस मार्क्स की उम्मीद करते हैं। केवल कम अंतर से फेल होने को अपने आप ग्रेस मार्क्स पाने का कानूनी आधार नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंधित विश्वविद्यालय या परीक्षा नियमों में स्पष्ट प्रावधान होना जरूरी है।

