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खो गई वो सुर्खी...: भोपाल के नवाबों का पसंदीदा 'बांग्ला पान' अब संकट में, 100 से घटकर सिर्फ 15 परिवारों तक सिमटी खेती

खो गई वो सुर्खी...: भोपाल के नवाबों का पसंदीदा 'बांग्ला पान' अब संकट में, 100 से घटकर सिर्फ 15 परिवारों तक सिमटी खेती

कभी भोपाल के नवाबों की शान और शौक का हिस्सा रहा बांग्ला पान आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिस पान वाली देवरी से कभी नवाबी दौर में खास तौर पर पान मंगवाया जाता था, वहां अब इसकी खेती तेजी से सिमटती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि जहां कभी करीब 100 परिवार इस पारंपरिक खेती से जुड़े थे, वहीं अब यह संख्या घटकर महज 15 परिवारों तक रह गई है।

नवाबी दौर की खास पहचान था बांग्ला पान

पान वाली देवरी का बांग्ला पान अपनी खास खुशबू, मुलायम पत्तियों और स्वाद के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। कहा जाता है कि भोपाल के नवाब भी यहीं से विशेष रूप से पान मंगवाते थे। यही वजह थी कि इस गांव की पहचान पूरे प्रदेश में पान की खेती के लिए होती थी।

लागत बढ़ी, मुनाफा घटा

किसानों का कहना है कि पान की खेती में लगातार बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार में घटती मांग के कारण इस व्यवसाय को जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है। पान की बेलों की देखभाल में काफी मेहनत और खर्च आता है, लेकिन उसके मुकाबले उचित दाम नहीं मिल पाते।

नई पीढ़ी का खेती से मोहभंग

खेती से पर्याप्त आय नहीं होने के कारण नई पीढ़ी भी अब इस पारंपरिक पेशे से दूरी बना रही है। युवा रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे पान की खेती करने वाले परिवारों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

सांस्कृतिक विरासत बचाने की चुनौती

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस पारंपरिक खेती को संरक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो आने वाले वर्षों में पान वाली देवरी की यह ऐतिहासिक पहचान पूरी तरह खत्म हो सकती है। किसानों ने सरकार से आर्थिक सहायता, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि इस अनूठी कृषि विरासत को बचाया जा सके।

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