खंडवा: चंद्रग्रहण के दौरान भी श्री दादाजी धूनीवाले मंदिर में दर्शन और पूजन जारी
देशभर में मंगलवार को लगने वाले चंद्रग्रहण के दौरान अधिकांश मंदिरों के पट बंद रहने की परंपरा है, लेकिन मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में स्थित श्री दादाजी धूनीवाले मंदिर में श्रद्धालु इस समय भी दर्शन और पूजन कर पाएंगे।
मंदिर प्रशासन ने बताया कि परंपरा और ‘केशव विनय’ पुस्तक के अनुसार, यहाँ ग्रहण का प्रभाव नहीं माना जाता। इसी वजह से श्रद्धालु ग्रहण काल में भी दादाजी की समाधि के दर्शन कर सकते हैं और अखंड हवन में भाग ले सकते हैं।
मंदिर में आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि दादाजी धूनीवाले की समाधि और हवन के माध्यम से भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और सुख-शांति मिलती है। यहां आने वाले श्रद्धालु ध्यान, पूजा और मंत्रोच्चारण के माध्यम से अपने मन की शांति प्राप्त करते हैं।
मंदिर प्रबंधन ने बताया कि ग्रहण के दौरान भी दर्शन और पूजन की सम्पूर्ण व्यवस्था की गई है। विशेष तौर पर यह सुनिश्चित किया गया है कि श्रद्धालु बिना किसी बाधा के पूजा और हवन में शामिल हो सकें। प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के भी इंतजाम किए हैं।
खंडवा के निवासी और आसपास के क्षेत्र के लोग इस अवसर पर मंदिर में दर्शन करने और हवन में भाग लेने के लिए आते हैं। उनका मानना है कि ग्रहण काल में भी यहाँ पूजा करने से भाग्य और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया गया है। इसके अलावा, मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों ने सुनिश्चित किया है कि सभी भक्त समाज और परिवार के नियमों का पालन करते हुए पूजा कर सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई मंदिरों में ग्रहण को लेकर अल्पवस्था और धार्मिक नियम का पालन किया जाता है, लेकिन दादाजी धूनीवाले मंदिर जैसी परंपराओं में इसे मान्यता नहीं दी जाती। यहां पूजा और हवन की निरंतरता के पीछे आध्यात्मिक विश्वास और ऐतिहासिक परंपरा का बड़ा योगदान है।
खंडवा के धार्मिक जानकार बताते हैं कि यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तों की आस्था का केंद्र माना जाता है। ग्रहण के समय भी पूजा और हवन के संचालन से भक्तों में शांति और मानसिक सुकून की भावना बनी रहती है।
इस प्रकार, श्री दादाजी धूनीवाले मंदिर में ग्रहण काल के दौरान भी दर्शन, पूजा और अखंड हवन जारी रहना श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष अवसर बन गया है। यह परंपरा दर्शाती है कि धार्मिक आस्था और मंदिर की व्यवस्थाएं स्थानीय परंपराओं और विश्वासों के अनुरूप कितनी दृढ़ और समर्पित हैं।

