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एमपी में 5 साल में 631.71% बढ़ीं बीमा संबंधी शिकायतें, गुजरात के बाद तीसरे नंबर पर मध्यप्रदेश

एमपी में 5 साल में 631.71% बढ़ीं बीमा संबंधी शिकायतें, गुजरात के बाद तीसरे नंबर पर मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में बीमा से जुड़ी शिकायतों में पिछले पांच वर्षों के दौरान तेजी से बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में बीमा संबंधी शिकायतों की संख्या 631.71 प्रतिशत तक बढ़ गई है। वहीं बीमा क्लेम रिजेक्ट होने के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है, जबकि गुजरात के बाद मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है। शिकायतों में इतनी बड़ी वृद्धि ने बीमा कंपनियों की सेवाओं, क्लेम निपटारे और ग्राहकों की समस्याओं को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीमा पॉलिसी लेने वाले ग्राहकों के लिए क्लेम का समय पर और उचित तरीके से निपटारा सबसे महत्वपूर्ण होता है। जब किसी दुर्घटना, बीमारी, संपत्ति के नुकसान या अन्य बीमित घटना के बाद ग्राहक क्लेम करता है तो उसे उम्मीद होती है कि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार उसे भुगतान मिलेगा। लेकिन क्लेम प्रक्रिया में देरी, दस्तावेजों की मांग, पॉलिसी की शर्तों को लेकर विवाद या क्लेम खारिज होने जैसी परिस्थितियों में ग्राहक शिकायत दर्ज कराते हैं।

मध्यप्रदेश में पांच साल के भीतर शिकायतों में 631.71 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत देती है कि बीमा क्षेत्र में ग्राहकों की समस्याएं बढ़ी हैं या शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया के प्रति जागरूकता में बड़ा इजाफा हुआ है। हालांकि केवल शिकायतों की संख्या बढ़ने को बीमा कंपनियों की खराब सेवा का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके पीछे पॉलिसीधारकों की संख्या में वृद्धि और ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था की आसान उपलब्धता जैसे कारण भी हो सकते हैं।

क्लेम रिजेक्शन के मामले में महाराष्ट्र सबसे ऊपर बताया जा रहा है। इसके बाद गुजरात और फिर मध्यप्रदेश का स्थान है। इसका मतलब है कि इन राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें पॉलिसीधारकों के क्लेम स्वीकार नहीं किए गए। क्लेम अस्वीकार होने के पीछे पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन, जरूरी दस्तावेजों की कमी, जानकारी छिपाना या पॉलिसी में शामिल न होने वाला जोखिम जैसे कई कारण हो सकते हैं।

बीमा क्षेत्र में ग्राहकों के लिए शिकायत निवारण की व्यवस्था भी मौजूद है। पॉलिसीधारक पहले संबंधित बीमा कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी के पास अपनी समस्या दर्ज करा सकता है। समाधान नहीं मिलने पर पात्र मामलों में बीमा लोकपाल जैसी व्यवस्था का सहारा लिया जा सकता है। बीमा से जुड़ी शिकायतों में क्लेम के भुगतान में देरी, क्लेम की राशि को लेकर विवाद और पॉलिसी की शर्तों से जुड़े मतभेद भी शामिल हो सकते हैं।

मध्यप्रदेश में शिकायतों में हुई इतनी बड़ी वृद्धि के बाद अब ग्राहकों के हितों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, पॉलिसी खरीदते समय नियम और शर्तों को अच्छी तरह समझना, जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखना और क्लेम की प्रक्रिया की जानकारी रखना बेहद जरूरी है।

वहीं बीमा कंपनियों के लिए भी शिकायतों का समयबद्ध और पारदर्शी समाधान करना महत्वपूर्ण है। ग्राहकों को क्लेम रिजेक्शन का स्पष्ट कारण उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि उन्हें अपनी स्थिति समझने और जरूरत पड़ने पर आगे शिकायत करने का अवसर मिल सके।

मध्यप्रदेश में पांच वर्षों में 631.71 प्रतिशत की वृद्धि ने बीमा क्षेत्र में ग्राहक शिकायतों की स्थिति को प्रमुख मुद्दा बना दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि शिकायतों में कमी लाने और क्लेम प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए बीमा कंपनियां और नियामक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं।

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