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जज को कत्लेआम की धमकी पर हाईकोर्ट सख्त, DGP-ACS से मांगा जवाब, वीडियो में कहा- फैसले से असहमति का मतलब धमकी नहीं

जज को कत्लेआम की धमकी पर हाईकोर्ट सख्त, DGP-ACS से मांगा जवाब, वीडियो में कहा- फैसले से असहमति का मतलब धमकी नहीं

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम मॉब लिंचिंग मामले में 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) तबस्सुम खान को कथित तौर पर कत्लेआम की धमकी दिए जाने के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) लिया है। हाईकोर्ट ने इस मामले को न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए राज्य सरकार से तीन दिन के भीतर जवाब तलब किया है।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और अपर मुख्य सचिव (ACS) से इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और न्यायपालिका की गरिमा से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है।

हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि किसी न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसका फैसला किसी वर्ग या पक्ष को पसंद नहीं आया। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की धमकियां न्यायिक व्यवस्था पर दबाव बनाने का प्रयास हैं और ऐसी घटनाएं कानून के शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।

खंडपीठ ने कहा कि न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से कार्य करने का संवैधानिक अधिकार है। यदि किसी पक्ष को किसी न्यायिक निर्णय से असहमति है तो उसके लिए कानून में अपील और पुनर्विचार जैसे वैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं, न कि धमकी या डराने-धमकाने का रास्ता।

सोशल मीडिया पोस्ट पर भी उठे सवाल

मामले में न्यायाधीश के खिलाफ कथित आपत्तिजनक और भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा का विषय बने हैं। इन पोस्टों को लेकर न्यायिक समुदाय में भी चिंता जताई गई है। अदालत ने संकेत दिया कि इस प्रकार की सामग्री न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित कर सकती है और इसकी भी जांच आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की प्रतिक्रिया

इस पूरे घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। संगठन ने कहा कि किसी भी न्यायिक आदेश से असहमति होने पर उसका समाधान अपीलीय अदालत में चुनौती देकर किया जाना चाहिए। न्यायाधीशों को धमकाना, उनके खिलाफ आपत्तिजनक अभियान चलाना या उन्हें बदनाम करने की कोशिश करना लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्यायिक संस्थाओं के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

संगठन ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

क्या है मामला?

यह मामला नर्मदापुरम के चर्चित मॉब लिंचिंग केस से जुड़ा है, जिसमें एडीजे तबस्सुम खान ने 14 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद सोशल मीडिया पर न्यायाधीश के खिलाफ कथित रूप से धमकी भरे और भड़काऊ संदेश प्रसारित होने की खबर सामने आई। इसी घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया।

अब राज्य सरकार को तीन दिन के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है और न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी, जिस पर कानूनी और न्यायिक जगत की नजरें टिकी रहेंगी।

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