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सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और मप्र सरकार को नोटिस; 17 अगस्त तक मांगा जवाब

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और मप्र सरकार को नोटिस; 17 अगस्त तक मांगा जवाब

मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मामला अब न्यायपालिका की चौखट तक पहुंच गया है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दोनों सरकारों से 17 अगस्त तक विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

याचिका में कहा गया है कि प्रदेश के अनेक सरकारी स्कूल लंबे समय से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कई विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के कारण एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं का संचालन करना पड़ रहा है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। इसके अलावा कई स्कूलों में पेयजल, शौचालय, बिजली, फर्नीचर और अन्य मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के शिक्षा के अधिकार को महत्वपूर्ण बताते हुए सरकारों से पूछा है कि शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने और स्कूलों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में सरकारों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपना पक्ष रखना होगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि शिक्षकों की कमी और संसाधनों के अभाव का सबसे अधिक नुकसान ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को उठाना पड़ रहा है। कई स्कूलों में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यदि समय रहते रिक्त पद नहीं भरे गए और स्कूलों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा।

हाईकोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने के बाद अब केंद्र और राज्य सरकार को 17 अगस्त तक अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों और प्रस्तुत जवाब पर विचार करेगी। माना जा रहा है कि इस मामले का फैसला प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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