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मेरठ कॉलेज से भोपाल तक: 1987 की घटना ने तोड़ दिया था बशीर बद्र का दिल, छोड़ना पड़ा शहर

मेरठ कॉलेज से भोपाल तक: 1987 की घटना ने तोड़ दिया था बशीर बद्र का दिल, छोड़ना पड़ा शहर

बशीर बद्र का मेरठ से रिश्ता सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं था, बल्कि इस शहर ने उनकी शायरी और पहचान को नई ऊंचाई दी। वर्ष 1974 में वह मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। इसके बाद करीब डेढ़ दशक तक उन्होंने शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग छाप छोड़ी।

डॉ. बशीर बद्र 1990 तक मेरठ कॉलेज से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ छात्रों को उर्दू साहित्य पढ़ाया, बल्कि अपनी गजल और शायरी से देशभर में प्रसिद्धि हासिल की। मेरठ के साहित्यिक माहौल ने उनके लेखन को नई पहचान दी और वे मुशायरों के लोकप्रिय शायर बन गए।

हालांकि वर्ष 1987 की एक दर्दनाक घटना ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। उस दौर में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों और हिंसा का असर बशीर बद्र की जिंदगी पर भी पड़ा। बताया जाता है कि इस हिंसा में उनका घर जल गया था और उनकी कई अनमोल किताबें, डायरी और साहित्यिक दस्तावेज राख हो गए।

इस घटना ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। वह मानसिक रूप से बेहद आहत हुए और धीरे-धीरे मेरठ छोड़ने का फैसला कर लिया। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया और वहीं रहकर साहित्य साधना जारी रखी।

बशीर बद्र ने कई बार अपने इंटरव्यू और शायरी में उस दर्द को महसूस कराया, जो उन्होंने उस दौर में झेला था। उनकी कई गजलें बिछड़ने, टूटने और यादों के दर्द को बेहद गहराई से बयान करती हैं।

उर्दू अदब के जानकारों का मानना है कि 1987 की घटना ने उनकी शायरी को और अधिक संवेदनशील और भावनात्मक बना दिया। उनके शब्दों में जिंदगी का दर्द और रिश्तों की कसक साफ झलकने लगी थी।

आज जब बशीर बद्र इस दुनिया में नहीं हैं, तब मेरठ और उनका साहित्यिक सफर एक बार फिर लोगों की यादों में ताजा हो गया है।

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