बशीर बद्र की जिंदगी की शाम बकरीद के दिन भोपाल में ढल गई। उर्दू शायरी की दुनिया में अपनी खास पहचान बनाने वाले बशीर बद्र के निधन की खबर से साहित्य जगत और उनके चाहने वालों में शोक की लहर दौड़ गई है।
फैजाबाद में जन्मे बशीर बद्र ने अलीगढ़ और मेरठ में रहते हुए अपनी शायरी से देशभर में पहचान बनाई। उनकी गजलें और शेर आम लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे। मोहब्बत, दर्द, रिश्ते और जिंदगी के एहसास को बेहद सरल लेकिन असरदार शब्दों में पेश करना उनकी खासियत थी।
बताया जाता है कि बशीर बद्र का जन्म वर्ष 1935 में हुआ था। यह एक खास संयोग था कि उस साल इस्लामी कैलेंडर की गणना के कारण रमजान का महीना दो बार आया था। अब बकरीद के दिन उनका इस दुनिया से जाना भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
बशीर बद्र ने लंबे समय तक शिक्षण कार्य भी किया और साहित्यिक दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी कई गजलें और शेर आज भी मुशायरों और साहित्यिक मंचों की शान माने जाते हैं।
उनके मशहूर शेर —
“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ कोई बेवफा नहीं होता”
और
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए”
आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखते हैं।
साहित्य प्रेमियों का कहना है कि बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं बल्कि एहसासों की आवाज थे। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी।
उनके निधन पर साहित्यकारों, राजनीतिक नेताओं और प्रशंसकों ने गहरा दुख जताया है। उर्दू अदब की दुनिया में इसे एक बड़ी क्षति माना जा रहा है।

