आदिवासियों के भूमि अधिकार का आकलन करेगी एकता परिषद, श्योपुर से 3500 किमी की पदयात्रा 10 दिसंबर से होगी शुरू
मध्य प्रदेश में आदिवासियों के भूमि अधिकार और आत्मनिर्भरता को लेकर एकता परिषद ने नया मॉडल पेश किया है। इसके तहत करीब 25 साल पहले हुए भूमि अधिकार आंदोलन के बाद जिन आदिवासी परिवारों को जमीन के पट्टे मिले थे, अब उनके जीवन में आए बदलावों का आकलन किया जाएगा। साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि जिन परिवारों को जमीन के पट्टे दिए गए थे, उनका वास्तव में जमीन पर कब्जा है या नहीं।
इस अभियान की शुरुआत 10 दिसंबर को श्योपुर जिले के एकतापुर गांव से होगी। यहां से 3500 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाली जाएगी। इस यात्रा के जरिए उन परिवारों तक पहुंचने की योजना है, जिन्हें वर्षों पहले भूमि अधिकार आंदोलन के बाद जमीन के पट्टे मिले थे। अभियान का उद्देश्य केवल पट्टे मिलने की जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि जमीन मिलने के बाद आदिवासी परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कितना बदलाव आया है।
25 साल पुराने आंदोलन का होगा आकलन
करीब 25 साल पहले श्योपुर से रायगढ़ तक भूमि अधिकारों को लेकर पदयात्रा निकाली गई थी। इस आंदोलन में आदिवासी और भूमिहीन परिवारों को जमीन का अधिकार दिलाने की मांग प्रमुखता से उठाई गई थी। आंदोलन के बाद कई परिवारों को जमीन के पट्टे मिले थे।
अब एकता परिषद इन परिवारों की मौजूदा स्थिति का अध्ययन करेगी। इसमें यह जानकारी जुटाई जाएगी कि पट्टा मिलने के बाद परिवारों ने जमीन पर खेती शुरू की या नहीं। उनके पास जमीन का वास्तविक कब्जा है या नहीं और जमीन से उनकी आजीविका में कितना सुधार हुआ है।
सिर्फ पट्टा नहीं, जमीन पर वास्तविक अधिकार की जांच
भूमि अधिकारों के मामले में कई बार सरकारी रिकॉर्ड में जमीन का पट्टा तो दर्ज हो जाता है, लेकिन संबंधित परिवार को जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं मिल पाता। कुछ मामलों में जमीन मिलने के बाद भी सिंचाई, खेती के संसाधन और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण परिवार उसका उपयोग नहीं कर पाते।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए इस बार अभियान में जमीन के कागजी अधिकार के साथ वास्तविक स्थिति पर भी ध्यान दिया जाएगा। इसके जरिए यह समझने का प्रयास होगा कि आदिवासी परिवारों को जमीन मिलने के बाद आत्मनिर्भर बनने में कितनी मदद मिली।
आत्मनिर्भरता के मॉडल पर रहेगा जोर
एकता परिषद का यह अभियान भूमि अधिकारों को आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। पदयात्रा के दौरान परिवारों से बातचीत कर उनके अनुभव जुटाए जाएंगे। जमीन के उपयोग, खेती, रोजगार और जीवन स्तर में आए बदलावों को समझने का प्रयास किया जाएगा।
10 दिसंबर से शुरू होने वाली 3500 किलोमीटर की यह पदयात्रा करीब 25 साल पुराने आंदोलन के परिणामों को जमीन पर परखने का प्रयास होगी। इसके निष्कर्षों के आधार पर आदिवासी परिवारों के भूमि अधिकार और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए आगे की रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।

